अखंडता(ईमानदारी और सत्यनिष्ठा)–गलत को सही कर देती है :-

अखंडता(ईमानदारी और सत्यनिष्ठा) का अर्थ है उस वक्त भी सही बात करना जब कोई देख न रहा हो।क्या कोई वादा तोड़ना या अपने वचन का पालन न करना गलत है ?आप क्या हैं,कायर या ईमानदार यदि आप अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटते हैं?और यदि आप अपना कोई वचन तोड़ते हैं तो क्या आप सज़ा भुगतने के लिए तैयार हैं?

कभी-कभी हम किसी भी काम को न नहीं कह पाते और अपने आप को जरूरत से ज्यादा बोझ तले कर लेते हैं।हम कई सारे काम एक साथ हाथ में ले लेते हैं और बाद में पाते हैं कि हम केवल एक पर ही ध्यान रख सकते हैं और केवल उसी के साथ न्याय कर सकते हैं।ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?क्या उन कामों को करना चाहिए चाहे वो अच्छे से संपन्न न हो सकें या हमें काम देने वाले से क्षमा मांग कर ,उस काम को किसी और को करने देने के लिए कह देना चाहिए?

हो सकता है ऐसा कर के हम ग्लानि महसूस करें कि काम करने का अपने वचन का हमने पालन नहीं किया।पर ज़रा सोचिये वक्त पर पीछे हटने से वो काम खराब होने से बच जाएगा और हम भी दूसरों की उम्मीदों पर विफ़ल नहीं होंगे।इस प्रकार एक ही काम पर केन्द्रित रहने से वो काम भी अच्छे से हो जाएगा।

हो सकता है बाद में छोड़े हुए काम के लिए हमें लोगों के ताने भी सुनने पड़े पर वो उस से कम ही होगा जो उस काम को ठीक से न कर पाने के कारण होता।इसलिए लोगों की बातें सुनने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए।इसी को अखंडता(ईमानदारी और सत्यनिष्ठा) कहते हैं और यही हमारे व्यवहार में,हमारे आचरण में और हमारी निजी और पेशेवर जिन्दगी में झलकना चाहिए।

अखंडता(ईमानदारी और सत्यनिष्ठा) के अगुआ विश्वसनीयता के भी अगुआ होते हैं।एक व्यक्ति जो अखंड(सत्यनिष्ठ और ईमानदार) नहीं होता वो कभी भी असली सफलता प्राप्त नहीं कर सकता और न ही वो कभी उन सभी का विश्वास जीत पाता है जिनकी वो अगुआई करना चाहता है या जिनको वो प्रभावित करना चाहता है।

अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) में वो दृढ-विश्वास भी शामिल है जिसे साथ वो कोई पक्का वादा करता है और वो हिम्मत भी शामिल है जिसके साथ वो किसी बात के लिए प्रतिबद्ध होता है।इसमें वो वफ़ादारी भी शामिल है जो किसी को भी जरूरी है अपने वादे पूरे करने के लिए और हर समय सच्चाई से जुड़े रहने की अटूट इच्छा भी शामिल है।

पर सबसे महत्वपूर्ण है कि अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) है असफलता को स्वीकार करने की,परिस्थितियों का सामना करने की काबीलियत और इस प्रक्रिया में अपने सिद्धांतों और सदाचार को पकडे रखने की काबीलियत।

अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) नैतिक मूल्यों की मजबूत प्रणाली पर टिकी हुई है और वो कभी भी बेईमानी और हेराफेरी के मध्य में विद्यमान नहीं रह सकती।विश्वास अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) के एक चरित्र से ही उत्पन्न होता है।इसलिए यदि आप  सोचते हैं कि आप कोई काम नहीं कर सकते हैं,लेकिन आप  कह चुके हैं कि आप कर सकते हैं,तो अपने शब्दों से पीछे हटने और माफ़ी मांगने से कोई नुक्सान नहीं होगा।इसमें कुछ भी गलत नहीं है बल्कि ये अखंडता (ईमानदारी और सत्यनिष्ठा) ही है।

हम सभी ने ये पुरानी कहावत जरूर सुनी होगी कि प्राण जाए पर वचन न जाए।अति प्राचीन काल से ही अपने वचन पर कायम रहना अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) का प्रथम निशान माना जाता है।इतिहास उन कहानियों सी भरा पड़ा है जो उन वीर पुरुषों और महिलाओं का महिमामंडन करते हैं जिन्होंने अपने वादों को पूरा करनी के लिए अपनी जान तक दे दी।

पर ऐसा बताने का अर्थ ये नहीं है कि आप भी ऐसा करें,लेकिन जो भी बड़ा या छोटा वादा आप करें उनके बारे में निश्चित रहें और उनको सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

तथापि,यदि परिस्थितियाँ आपको ऐसी अवस्था में डाल दें जहां आपके पास अपनी प्रतिबद्धता को तोड़ने के अलावा कोई चारा न हो,स्वयं को आगामी सजा और परिणामों का सामना करने के लिए तैयार कर लें।पीछे हटने और दया की भीख मांगने की कोई जरूरत नहीं है।इतना साहसी बनें कि आप अपनी गलती को स्वीकार कर सकें,अपनी बात पर दृढ रह सकें और साहसपूर्वक प्रतिक्रियाओं का सामना कर सकें चाहे वो कितनी भी बुरी क्यों न हों।

आपकी सच्ची अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी) निहित है कि आप किस प्रकार असफलताओं,अपनी गलतियों और परिणामों का सामना करते हैं।खेद प्रकट करने में संकोच न करें।क्षमायाचना और ईमानदार स्वीकारोक्ति आपकी विश्वसनीयता को बढ़ाती है।

महात्मा गांधी की अपनी गलतियाँ मानने और अपनी खामियों को साफ़-साफ़ कहने           की काबीलियत ने उनको महान बना दिया।उदाहरण स्वरुप उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि हालांकि वो एक अच्छे व्यक्ति थे ,पर अक्सर वो सभी चुनाव बेहतर नहीं कर पाते थे।जब वो बालक थे,कुछ समय के लिए,वो ऐसे लोगों की सोहबत में पड़ गए जो हमेशा मुसीबतों को न्योतते थे और सही लोग नहीं थे।उनके साथ गांधी जी ने धुम्रपान करना,चोरी करना और यहाँ तक की माँस खाना भी शुरू कर दिया,जो कि उन के धर्म में निषेध था।

उन्हें अपने किये का बहुत बुरा लगा और उन्होंने अपने पिताजी को सब कुछ बताने का,माफ़ी मांगने का और सजा के लिए कहने का निर्णय लिया।यहाँ तक कि उन्होंने अपने पिताजी से ये भी कहा कि उन्हें ऐसे बालक का पिता होने के लिए,जो ऐसी गलत बातें कर सकता है,शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।

इस एक वाकये ने गांधी जी की,जितना अच्छे व्यक्ति वो बन सकते थे,बनने में बहुत मदद की।वे अपनी आत्मकथा में ये भी लिखते हैं कि ईमानदार स्वीकारोक्ति ने उनके प्रति उनके पिता का स्नेह और बढ़ा दिया था और उनके रिश्ते को भी मजबूत किया था।न केवल गांधी जी अपनी गलतियों के लिए क्षमाशील थे अपितु किसी भी प्रकार की सजा के लिए भी तैयार थे जो उनके पिताजी अपना भरोसा तोड़ने के लिए उनको देते।वाकई गांधी जी अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी ), के प्रतीक थे।

अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी ),कई अन्य बातों के बीच,विकसित होती है- स्वयं की भूल मानने से,अपने शब्दों का मान रखने में विफल रहने की बात मानने से और सामने वाले व्यक्ति को ये एहसास दिलाने से कि आप इन सब के लिए कितने ज्यादा शोकार्त हैं।

साथ ही अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी ),का सबसे बड़ा सिद्धांत है,स्वयं को अपनी त्रुटियों के प्रतिकूल परिणामों का सामना करने के लिए तैयार करना।इसलिए भरोसेमंद बनें।कोई भी वादा करने से पहले बुद्धिमत्ता से विचार करो और जब वादा कर देते हो तो उसे पूरा करने का प्रयत्न करो।हालांकि,किसी कारणवश यदि आप असफल हो जाते हो,अखंडता(सत्यनिष्ठा और ईमानदारी ),से भरपूर व्यक्ति बनो और इसका उपयोग गलत को सही करने में करो।