अच्छे बनो:-
कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए की लोग हमारे बारे मे क्या सोचते हैं। जरूरी नहीं है की यदि आप ख़राब हों तभी आपको कोई ख़राब बताये। या कोई हमें अच्छा बताये तो ही हम अच्छे कहलाए जाएंगे। दूसरे हमारे बारे मे कोई भी राय बनाएं हमें अपने आप को अपनी नज़र से देखना चाहिए कि मैंने कोई गलती तो नहीं की,कोई न्यायविरुद्ध काम तो नहीं किया।

यदि हमने गलती की है तो उसे सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। पर  जब हमारी नीयत ठीक है ,कार्य ठीक है ,विचार अच्छे हैं ,हमारी भावना ठीक है तो हमें न तो ये आशा करनी चाहिए कि कोई हमें अच्छा समझे ,न ही किसी के बुरा समझने से हमें भय करना चाहिए। क्यूंकि हम तो जैसे हैं वैसे ही रहेंगे। हम हम अच्छे नहीं हैं और सब हमें अच्छा समझें तो क्या हमारा अच्छापन सिद्ध हो जाएगा। अतः खुद से अच्छा बनने का प्रयास करना चाहिए।

पर कभी कभी हम स्वार्थ और अभिमान वश अपने अंदर छिपी गलतियों को नहीं देख पाते। स्वार्थ जब होता है जब हम हर वक्त अच्छा कहवाए जाने की कामना करने लगते हैं और उस मे संतुष्टि और अभिमान का अनुभव करते हैं।

यही अभिमान हमें हमारे अंदर छुपी बुराईओं को दूर करने नहीं देता। इसलिए कभी स्वार्थ और अभिमान न करें। जब हम अपना स्वार्थ और अभिमान छोड़ देते हैं तब हमें प्रकाश मिलता है और हमारी बुराईयां हमें दिखने लगती हैं।

अपने अवगुणों को दूर करने का एक उपाए है की जो भी अवगुण हमें दिखें उनको दूर करने का प्रयत्न करें। जो अवगुण आसानी से छोड़े जा सकें ,उन्हें छोड़ दें। धीरे -धीरे जो अवगुण मुश्किल से छोड़े जाते वह भी आसानी से त्यागे जा सकेंगे फिर इन सब के पीछे छिपे अवगुण भी दिखने लगेंगे और उनको भी छोड़ा जा सकेगा।

हम सत्संग के द्वारा भी अपने अवगुणों को दूर कर सकते हैं। सत्संग करने से हमें अपने अंदर छुपी बुराइयां पता चलने लगती हैं ,और धीरे -धीरे सत्संग के प्रभाव से हमारे अंदर सद्गुण आने लगते हैं और हमारे अवगुण दूर हो जाते हैं।

जो अवगुण साफ़ दिखता है ,जिसको दूर करने मे कोई मेहनत नहीं ,कोई हानि नहीं उसको दूर कर दो।  हमेशा मन मे ये विचार रखो कि हमें अपने अवगुण अपने अंदर नहीं रखने हैं।  वे बार बार लौटेंगे आप बार बार उन्हें बाहर निकलो। फिर वे आप मे घर करना छोड़ देंगे।

कभी भी किसी के बनाने से हम अच्छे नहीं बन सकते। हमारे गुरुजन ,हमारे मात -पिता चाहते हैं की हम श्रेष्ठ बने पर वे हमें सीख दे सकते हैं पर जब तक हम ना चाहें वह हमें श्रेष्ठ नहीं बना सकते। अतः हमें  अपने आप ही प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा इसलिए है की आदमी स्वयम ही अपना मित्र और शत्रु है। तो हम अपनी बुराईयों को,गलतियों को खुद ही सुधार लें तो हम श्रेष्ठ बन सकते हैं।

कभी ये उम्मीद न करें की लोग आपको अच्छा कहें।  न ही इससे भयभीत हों की कोई आप को बुरा न कह दे। क्यों की भय होगा तो भी आप ऊंचा नहीं उठ सकते। जो लोग इस बात पर निर्भर करते हैं कि लोग आपके बारे मे क्या कहेंगे वो ऊंचा क्या उठेंगे क्यूंकि सभी आप को अच्छा कहें ये संभव नहीं है और लोग तो न होने पर भी आप मे अवगुण बता सकते हैं क्यूंकि वो आपको दुखी करने के लिए ,चिढ़ाने के लिए ऐसा कह सकते हैं। चाहे वो जानते हों की ऐसा नहीं है।

इसलिए आप स्वयं अच्छे बनें ,पर औरों से उम्मीद मत करें की वो आप को अच्छा कहें। क्यूंकि जयादातर लोग जानते हुए भी आपको अपने फायदे के लिए अच्छा नहीं कहेंगे। इसलिए अच्छा कहलाने की इच्छा छोड़ दो। अच्छा कहलाओ मत अच्छा बनो। आपकी अच्छाई की गूँज दूर दूर तक अपने आप ही फैल जायेगी ,जिस तरह से सुगन्धित फूल की फैलती है।