अपने बच्चों के बारे में स्वप्न न देखें ,अपने बच्चों के साथ स्वप्न देखें:-

अचानक जब हम देखते हैं कि हमारे बच्चे ११वीं कक्षा या १२ वीं कक्षा में पहुँच गए हैं तो हमारी चिता का स्तर एकदम से बढ़ जाता है।हम सोचने लगते हैं कि अब समय है कि वो क्या चुने जिससे उसका भविष्य निर्धारित हो सके।यह महत्वपूर्ण और अति नाजुक हो जाता है कि बच्चा कौन सी स्ट्रीम ले,कौन सा कॉलेज ले या कौन सी कंपनी चुने?

अधिकतर माता-पिता स्वयं को इस समय किंकर्तव्यविमूढ पाते हैं।उनका  सम्पूर्ण उद्देश्य अपने बच्चों को संबल देना और ये सुनिश्चित करना होता है कि उन्हें सबसे बेहतर मिले और वो अपनी जिन्दगी का बेहतर उपयोग कर सकें।लेकिन न जाने क्यों,इस समय जो भी माता-पिता करते हैं वो या तो बहरे कानों में जाता प्रतीत होता है या बच्चों द्वारा अलग ही तरीके से ले लिया जाता है।

क्या वे स्वयं ही विमूढ़ हैं ?उत्तर है हाँ।क्या वे संस्‍कारग्राही उम्र में हैं ?उत्तर है हाँ।वे जल्दी ही किसी से प्रभावित हो जाते हैं।कभी उन्हें लगता है कि डॉक्टर बनना सही है तो कभी लगता है कि वैज्ञानिक।कभी वो सी०ए० बनना चाहते हैं तो कभी खिलाड़ी।इस प्रकार प्रतिक्षण उनका लक्ष्य बदलता रहता है और उनका चुनाव भी।

माता-पिता अक्सर तीन तरह से सोचते हैं।माता-पिता की हैसियत से या तो उन्हें पता होता है कि वो बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं या वे विमूढ़ होते हैं और अपने बच्चों को दोष देते रहते हैं कि वो इस विषय में कुछ नहीं कर रहे हैं या बिलकुल ही बेपरवाह होते हैं और सोचते हैं कि कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा।

चाहे माता-पिता किसी भी तरह से सोचें पर पर उन्हें ये एहसास होना बहुत ही जरूरी है कि ये उनके बच्चों के लिए बहुत ही उथल-पुथल वाला समय है और उन्हें इस समय अपने माता-पिता की अन्य समय की अपेक्षा सबसे अधिक जरूरत होती है।इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वो अपने बच्चों के साथ इस समय उनके हर कार्यों में सम्मिलित हों और उनको निर्णय लेने में उनकी मदद करें।इस बात को उन्हें अपनी प्राथमिकता में शामिल कर लेना चाहिए।

वक्त न केवल पहले से बहुत बदल गया है बल्कि इसकी भूतकाल से कोई समानता ही नहीं रही है।न केवल प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गयी है,अपितु भविष्य के लिए विकल्प भी असंख्य हो गए हैं।आज का संसार पूरी तरह से नया सा है।बच्चों को अनगिनत जानकारी मिल रही हैं और उनका एक्सपोज़र पहले से बहुत बढ़ गया है।

पर अक्सर माता-पिता अपने समय के हिसाब से ही सोचते हैं।उनको ये एहसास नहीं होता कि बदली हुई वास्तविकताओं से निबटने का उनका तरीका नहीं बदला है।वे अब भी अपने समय की सुरक्षा और नैतिकता में ही जी रहे हैं और उन के हिसाब से ही आज की समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं।

जबकि आवश्यकता इस बात की है कि माता-पिता बच्चों के सहभागी बनें।योगदान माता-पिता द्वारा इसमें आज के युग के हिसाब से खुद को उन्नत कर के किया जा सकता है।विभिन्न विकल्पों के बारे में जान कर,अपने बच्चों के कौशल और रुझान उनकी दिलचस्पी और जूनून के बारे में जान कर माता-पिता ऐसा कर सकते हैं।माता-पिता को अपना समय देना होगा और स्वयं को अपने बच्चों के और करीब लाना होगा ताकि उनकों भी लगे कि उनके माता-पिता न केवल उनके लिए अपना योगदान देना चाहते हैं बल्कि उनके भविष्य में रुचि रखते हुए उनके साथ अंतिम मील तक भी जाने को तैयार हैं।

कभी-कभी बच्चे माता-पिता से ये शिकायत करते हैं कि वे कुछ नहीं जानते,और इससे उन्हें चोट पहुँच सकती है।पर माता-पिता को चाहिए कि इस चोट से ऊपर उठ कर उन बातों को जानने की कोशिश करें जो वो नहीं जानते।माता-पिता को जानना चाहिए उनका वक्त आसान था,उस समय कम विकल्प थे जिनमें से चुनाव करना था,इसलिए सब कुछ अपने आप ही हो जाता था।

माता-पिता को चाहिए कि वो बच्चों के साथ सोचें,उनके साथ चर्चाएँ करें,उनके संसार को जानें,उनकी चिंताओं को जानें,उनके प्रश्नों को जानें,उनके साथ बैठ कर अलग अलग विकल्पों की छान-बीन करें,विभिन्न विकल्पों की खोज-बीन करें और सबसे जरूरी अपने बच्चों के साथ भाग ले कर खुद को प्राप्त करें।

एक अच्छी स्ट्रीम या जीवन-यात्रा को चुनने का तरीका एक सपने से शुरू होता है।उस सपने से नहीं जो माता-पिता अपने बच्चों के लिए देखते हैं बल्कि जो उनके बच्चों के लिए बेहतर है और उनकी इच्छाओं के साथ मेल बिठाये।इसलिए माता-पिता को समय-समय पर अपने बच्चों के साथ उनके सपनों पर चर्चा करनी चाहिए।जब वे ऐसा करते हैं तो बच्चों की आँखों में जो चमक आती है उसको महसूस करना चाहिए।इस प्रक्रिया में घंटों,दिन या हफ्ते लग सकते हैं।माता-पिता को ध्यान रखना चाहिए कि संसार की प्रत्येक खोज,नवोत्थान एक सपने से ही शुरू हुई थी।कभी-कभी माता-पिता सोचने लगते हैं कि उनका बच्चा आलसी है,जबकि कोई भी आलसी नहीं होता।वो बच्चा अभी तक वो नहीं खोज पाया है जिसके लिए वो बना है।

बच्चों की आँखों की चमक बरकरार रखने के लिए उस सपने को पूरा करने के लिए योजना बनानी चाहिए जिसकी वजह से उनकी आँखों में चमक आई थी।माता-पिता को बच्चों के साथ इस बात पर चर्चा करनी चाहिए कि वे कहाँ पहुंचना चाहते हैं,वे वहाँ तक कैसे पहुंचेंगे और फिर कार्य योजना बना कर अपने लक्ष्य से आज तक,ताकि बच्चा अपने लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता बना सके।

समय-समय पर लक्ष्य तक पहुँचने के तरीकों की आवधिक समीक्षा भी करनी चाहिए और कार्रवाई के दौरान यदि भूल सुधार की जरूरत हो तो उसे भूल-सुधार करना चाहिए।यदि कुछ नहीं जानते हैं तो उसे खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।इस प्रकार माता-पिता स्वयं और बच्चों के लिए तरक्की के सभी द्वार खोल सकते हैं,एक दूसरे को बेहतर समझ सकते हैं और अपने बच्चों के सबसे अच्छे दोस्त बन सकते हैं।