“अप्पो दीपो भवः- “
मनुष्य जीवन की माँग है कि उसे ख़ुशी चाहिए ,पुष्टि चाहिए ,प्रकाश चाहिए ,सहानुभूति एवं स्नेह चाहिए। भगवान बुद्ध ने कहा था “अप्पो दीपो भवः “,अर्थात स्वयं अपने ही दीपक को जलाओ। इस हृदय के दीपक को ,ज्ञान के दीपक को जलाना ही जीवन की दीपावली है। दीपावली पर भी दीप जलाने का ये ही उद्देश्य है कि स्नेह,प्रकाश और पुष्टि उत्पन्न करना।
जब बालक छोटा होता है तो उसे अँधेरे से भय लगता है ,अँधेरे कमरे में जाने की कल्पना भी उसे भयभीत करती है। अन्धकार से भयभीत होना मनुष्य की मूल प्रकृति में निहित है ,वह अन्धकार में रहना पसंद नहीं करता। सामान्यः मनुष्य के भीतर भी अन्धकार ही होता है और अन्धकार होता है अज्ञान का ,संशय का ,अविश्वास का ,क्रोध का ,काम का ,अहं का और जब अंदर अन्धकार ही होता है ,तो व्यक्ति अपनी मूल प्रकृति के कारण भीतर झाँकने से घबराता है ,वह भीतर की अपेक्षा बाहर ही देखना पसंद करता है। अंदर के मनुष्य का दम उसी अन्धकार में घुटता रहता है।
व्यक्ति बाहर के अन्धकार से उतना भयभीत नहीं होता ,जितना कि वह इस भीतर के अन्धकार से होता है। तभी तो वह अकेले रहना नहीं चाहता ,अकेला होता है तो घबराने लगता है ,क्योंकि तब उसका सामना उसके भीतर के मनुष्य से होता है ,जो अन्धकार में घुट रहा होता है। वह अपने ही अन्धकार से घबरा जाता है।
परन्तु ऋषि तो कह रहे हैं कि मनुष्य के भीतर ही सहस्त्र कोटि सूर्यों का प्रकाश विद्यमान है ,जिसके प्रकाश से आलोकित होकर व्यक्ति आत्मलीन हो जाता है ,उसके ज्ञान नेत्र खुल जाते हैं। परन्तु यदि भीतर इतने दिव्य प्रकाश की सम्भावना है तो उसे कैसे प्राप्त किया जाए ?
जैसे अमावस्या के अन्धकार में दीप जलाए जाते हैं ,वैसे ही मनुष्य का प्रारब्ध चाहे कैसा भी हो ,गुरू ज्ञान रूपी प्रकाश और अपने पुरूषार्थ के द्वारा वह अपने अंधकार में डूबे जीवन को प्रकाशमय कर सकता है।
“असतो मा सदगमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतंगमय। “
अर्थात हम असत्य से सत्य की ओर चलें। अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने का पुरूषार्थ करें मृत्यु से अमरता की ओर चलें। जन्म से -मरने वाली देह को सत्य मानने की भूल निकाल दें। मरने के बाद भी जो रहता है ,उस अमृत स्वरूप में आयें।