अशांति का मूल कारण और उसका निवारण:-

आज का आधुनिक समाज विभिन्न प्रकार के दुखों से घिरा हुआ है।यहाँ तक कि हमारी पूरी जिन्दगी भी इन दुखों को सुनने के लिए कम पड़ जाती है।अलग-अलग धर्म और धर्मगुरु हमें इन दुखों से,इस अशांति से निबटने के विभिन्न उपाय बताते हैं।पर दिन-प्रति-दिन हमारे भीतर की अशांति बढती ही जाती है।ऐसा क्यों है?

ऐसा शायद इसलिये है कि हम अपने भीतर की अशांति को ठीक से समझ नहीं पाए हैं।जब तक हम अपने भीतर की इस अशांति का कारण ठीक से समझ नहीं पायेंगे तब तक हम इसे दूर कैसे कर पायेंगे।अशांति का मूल कारण है शारीरिक चेतना जो हमारे सभी विकारों का मूल कारण है जिनके द्वारा हम अशांति को प्राप्त होते हैं।

जब हम केवल इस शरीर को ही सब कुछ मानने लगते हैं तो हम खुद को एक शारीरिक काया मानने लगते हैं और अन्य शरीरधारियों के साथ नश्वर रिश्ते बनाने लगते हैं।इस प्रकार हम आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भूल जाते हैं जो सब सुखों का दाता है।हम अन्य भौतिक प्राणियों के साथ सम्बन्ध जोड़ते हैं और जिससे हमें उनमें आसक्ति की भावना का जन्म होता है।जब भी हमसे जुड़े व्यक्ति को कोई हानि होती है तो हम  दुखी और अशांत हो जाते हैं।जब हमें उनका सहयोग नहीं मिलता तो हम उनसे नाराज हो जाते हैं और अपनी मानसिक शांति खो बैठते हैं।यदि कोई हमसे ज्यादा तरक्की कर लेता है तो हम उससे जलने लगते हैं और उससे शत्रुता बना लेते हैं।

इसी प्रकार हम काम के चंगुल में भी फंस जाते हैं।केवल शारीरिक आकर्षण में फंस कर हम धर्म-कर्म भूल जाते हैं और सदा काम से वशीभूत हुए हम तरह-तरह की बीमारियों को न्योता देते हैं।हमारा शरीर बीमारियों का घर बन जाता है।

इस प्रकार वह आत्मविकास का मार्ग छोड प्रतिक्षण उन की सुख शान्ति के लिए लगा रहता है और शिकायत करता रहता है कि वह भंवर में फंसा हुआ दलदल में धंसता जा रहा है।इस प्रकार अपनी कामुकता के कारण मनुष्य अपनी आभा और पराक्रम खो देता है।उसकी सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती है और वह विषम परिस्थितियों का सामना करने की बजाय क्रोध करने लगता है।

जिन भी प्राणियों को वो आत्मा न मान कर शरीर मानता है और अपनी पत्नी,बेटा,बेटी,माँ,बाप मानता है,उनके लिए वह दिन रात मेहनत करता है ताकि उनकी जरूरतों को पूरा कर सके।इस प्रकार वह निन्यानवे के चक्कर में पड़ जाता है और उसकी पैसे की भूख अर्थात् उसका लालच बढता ही जाता है।अपने इस लालच को पूरा करने के लिए वो गलत काम करने लगता है और डर की वजह से अशांति का शिकार हो जाता है।

इसी प्रकार जब मनुष्य खूब धन कमा लेता है,बड़े-बड़े लोगों से रिश्ता बना लेता है,तब उसके अन्दर अहंकार की भावना आ जाती है कि देखो मैं कितना अमीर आदमी हूँ,मेरे बड़े-बड़े दोस्त हैं,आदि-आदि।जब यही दोस्त और पैसा एक दिन धोखा देता है तो व्यक्ति को गहरा सदमा लगता है और वो अशांति का शिकार हो जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं शारीरिक जुड़ाव अथवा शारीरिक चेतना ही समस्त दुर्गुणों का कारण है जिनसे हमें विभिन्न बीमारियों,दुःख और परेशानियों को झेलना पड़ता है।यदि हम सम्पूर्ण आनंद अर्थात् परमानंद चाहते हैं और शान्ति से रहना चाहते हैं तो हमें शारीरिक जुड़ाव की इस प्रवृति से छुटकारा पाना होगा।

हमें अपनी आत्मा से जुड़ाव पैदा करना होगा,अर्थात् मानसिक चेतना को जागृत करना होगा।जब हम अपनी आत्मा से जुड़ने लगते हैं तो हम सांसारिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं और उनसे जुड़ाव ख़त्म होने लगता है।अर्थात् हम नश्वरता को छोड कर शाश्वत आत्मा को जानने लगते हैं।

इस प्रकार हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रहेगी और संसार से समस्त बुराइयों का नाश हो जाएगा,जो हमारी ईर्ष्या और दुर्भावनाओं के कारण उत्पन्न होती हैं और जिनका मूल कारण शारीरिक चेतना है।

जब हम शारीरिक चेतना अर्थात् शारीरिक जुड़ाव से निकल कर मानसिक चेतना को जागृत करेंगे तो ये जगत फूलों से भरा बगीचा हो जाएगा,जहां हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी।सभी मनुष्य भक्त हो जाएंगे और परमानंद को प्राप्त होंगे।इसी को परम लोक कहा गया है।

अत: हमें शारीरिक जुड़ाव न रखते हुए और भौतिकता को त्यागते हुए आत्मिकता को अपनाना चाहिए क्योंकि जब हम आत्मा को जानेंगे तो परमात्मा को जानेंगे।इस ज्ञान के बिना हम कभी भी उस परमात्मा की सत्ता तक नहीं पहुँच सकते जो हमें परमानंद और परम शान्ति का अनुभव कराता है।