अस्तेय:-
किसी प्रकार से भी किसी के स्वत्व -हक़ का न छीनना ,न चुराना ‘अस्तेय ‘कहलाता है। अस्तेय सत्य का ही रूपांतर है। केवल छुप कर किसी वस्तु अथवा धन का हरण करना ही स्तेय  नहीं  हैं ,जैसा कि साधारण मनुष्य समझते हैं। भूख से तंग आकर उदर -पूर्ति के लिए चोरी करने वाला निर्धन स्तेय पाप का इतना अधिक अपराधी नहीं है ,जितने कि निम्न श्रेणी वाले सम्पत्तिशील।
अन्यायपूर्वक किसी के धन ,द्रव्य अथवा अधिकार आदि का हरण करना ‘स्तेय ‘ है। पर इस प्रकार किसी वस्तु को  प्राप्त करने का मूल कारण लोभ  और राग होना ही स्तेय समझना चाहिए  और इसका त्यागना अस्तेय है।
स्तेय के उदाहरण :

वो लोभी जमींदार ,जो गरीब किसानों से अत्याचार द्वारा धन प्राप्त करते हैं,फैक्ट्रियों के वो  लोभी मालिक,जो मजदूरों को पेट भर भी  अन्न न देकर सब नफ़ा अपने पास रखते हैं,वो लोभी साहूकार ,जो दूना ब्याज लेते हैं और गरीबों की जायदाद को अपने अधिकार में लाने की चिंता में लगे रहते हैं,वो धोखेबाज व्यापारी ,जो वस्तुओं में मिलावट करके ,धोखा देकर अधिक लाभ कमाना चाहते हैं,वो रिश्वतखोर न्यायाधीश तथा अन्य अधिकारीगण ,जो वेतन पाते हुए भी कर्तव्यपालन में प्रमाद करते हैं और रिश्वत लेते हैं,वो लोभी वकील ,जो केवल फीस के लोभ में पड़ कर झूठे मुक़दमे लड़वाते हैं,वो लोभी डॉक्टर ,जो रोगी का ध्यान न रख कर केवल फीस का लोभ रखते हैं,वे सारे मनुष्य ,जो अन्यायपूर्वक किसी भी अनुचित रीति से धन ,वस्तु अथवा किसी भी अन्य लाभ को प्राप्त करना चाहते हैं सारे के सारे स्तेय के उदाहरण हैं।

विभिन्न प्रकार के आंदोलन अस्तेय-व्रत के यथार्थ रूप से पालन करने से शांत हो सकते हैं।
महर्षि पतंजलि ने कहा है कि –‘अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्। ‘ अर्थात अस्तेय की दृढ़ स्थिति होने पर सब रत्नों की प्राप्ति होती है।
जिसने राग को पूर्णतया त्याग दिया है ,वह सब प्रकार की संपत्ति का स्वामी है। उसको किसी चीज की कमी नहीं रहती। इसमें एक आख्यायिका है –
किसी निर्धन पुरूष ने बड़ी आराधना के पश्चात धन संपत्ति की देवी के दर्शन किये। उसके पैरों की एड़ी और मस्तिष्क घिसा हुआ देख कर उसको आश्चर्य हुआ। अपने भक्त के आग्रहपूर्वक विनय पर उसको बतलाया कि जो मुझसे राग रखते हैं और धर्म-अधर्म का विवेक त्यागकर मेरे पीछे मारे-मारे फिरते हैं ,उनको ठुकराते हुए पैर की एड़ी घिस गयी है और जिन्होंने ईश्वर -प्रणिधान का आसरा लेकर मुझसे राग छोड़ दिया है तथा मुझसे दूर भागते हैं ,उनको रिझाने और अपनी ओर प्रवृत्त करने के लिए उनकी चौखट पर रगड़ते -रगड़ते मस्तिष्क घिस गया है।
अतः श्री रामचरित मानस में तुलसीदास जी महाराज ने कहा है –
“लोभ सकल पापनि करि सूला “
अर्थात लोभ सभी पापों का मूल कारण है। इसलिए ईश्वर -प्रणिधान पूर्वक यानि फल सहित सब कर्मों को उसके समर्पित करके -“जथा लाभ करि मन संतोषा।।” की भावना से अनुत्तम सुख को प्राप्त कर प्रसन्न रहे।
इस विषय में गुरू नानक देव जी ने कहा है – “बिन संतोष नहीं कोई राजे।  सकल मनोरथ बृथे सब काजे।।”
इसी प्रकार धन-वैभव के सम्बन्ध में संत कबीरदास ने कहा है –
गौधन ,गजधन ,वाजिधन और रतन धन खान। जब आवै संतोष धन ,सब धन धूरि समान ।।