आनंद:-
अपनी शक्तिओं को यदि काम करने मे लगाया जाए तो आनंद की प्राप्ति होती है।केवल न्याय ही वास्तविक आनंद है। केवल आनंद ही कल्याणकारी अनुभूति है। आनन्दित होने का स्थान यहीं है। आनन्दित  होने का समय अभी है। दूसरों के आनंद मे सहायक होना ही सच्चा आनंद है।
ऐसी मित्रताएं जिनमे बड़ा मेल भी है और बड़ा झगड़ा भी लेकिन फिर भी बड़ा प्यार है बड़ी आनंददायक हैं। आनंद सर्वोत्तम मदिरा है। समय बहुत ही अनमोल है। यदि हम इसका सदुपयोग करेंगे ,इसका एक -एक पल परिश्रम  मे बिताएंगे तो हमें कोई अफ़सोस या पछतावा नहीं होगा की हमने जीवन व्यर्थ गवां दिया। समय का सदुपयोग करने वाले हमेशा आनन्दित रहते हैं।
आनंद ऐसा  इत्र है जिसे जितना अधिक आप दूसरों पर  छिड़केंगे ,उतनी ही अधिक सुगंध आपके अंदर आएगी। आनन्दित होना ही सब सद्गुणों को जन्म देता है और जो सदाचारी है वही आनन्दित है। वास्तविक और ठोस आनंद वहीँ प्राप्त होता जहाँ हम किसी चीज़ की अति नहीं करते। महान उद्वेश्य की प्राप्ति के लिए पर्यटनशील रहने मे ही वास्तविक आनंद है।
लोग तुम्हारे बारे मे सोचेंगे यदि तुम उनको आनंद [ख़ुशी]दोगे। परिश्र्म  है तो जीवन है और जीवन है तो आनंद है। ज्ञान और प्रेम आनंद से ही उपजते हैं। समस्त कर्म का लक्ष्य आनंद की ओर  है एवं आनंद का लक्ष्य कर्म की ओर  है। आनन्दित रहने से मष्तिष्क मे अच्छे विचार आते हैं और चित्त शुभ कामों  की ओर  लगा रहता है।
यदि हम जीवनपथ पर फूल नहीं बिखेर सकते तो काम से काम उस पर आनंद तो बिखेर ही सकते हैं। बिना काम किये कभी आनंद की प्राप्ति नहीं होती। आनंद बाह्य परिस्थितयों  पर नहीं ,भीतरी परिस्थितयों पर निर्भर है। ज्ञान प्राप्त करना ही मन का वास्तविक आनंद है। मनुष्य अपने आनंद का निर्माता स्वयं है।
वही सफल होता है जिसका काम उसे निरन्तर आनंद देता है। जो वस्तु आनंद प्रदान नहीं कर सकती ,वह सुन्दर नहीं हो सकती ;और जो सुन्दर नहीं हो सकती तो वह  सत्य भी नहीं हो सकती। मतलब ये कि  जहां आनंद है वहाँ सत्य है। आनंद ही व्यवहार मे उदारता का कारण है। भलाई करने से ही मनुष्य को निश्चित रूप से आनंद मिलता है।
भीड़  का आनंद वही लेता है ,जो एकांत का सेवन करता है। आनंद बढ़ता है ज्ञान और सदगुणों  के साथ। सज्जन लोग ही सर्वाधिक आनन्दित हैं। आनन्दित व्यक्ति अधिक जीते हैं और सार्थक जीते हैं। मन को आनन्दित करो ताकि कोई भी बुरी भावना इसमें घर ना कर सके। आत्मा का आनंद कर्मशीलता मे है।
उस तुच्छ व्यक्ति का चित्त कभी आनन्दित नहीं हो सकता जिसने पैसे की खातिर अपना ईमान बेच दिया हो। आनंद वह प्रसन्नता है,जिसके भोगने पर पछताना नहीं पड़ता। असली आनंद त्याग करने और परोपकार करने मे है ना की संग्रह करने और स्व-उपकार मे। आनंद शाश्वत है। यह कभी नहीं मरता।