आलोचनात्मक रूप से सकारात्मक बनें,सकारात्मक सोचें और आशावादी बनें:-

आलोचना को सही भाव से लेना किसी को भी जीवन में आगे बढ़ने में मदद करता है।वो व्यक्ति,जो ये जानता है कि आलोचना से किस तरह से निबटना है,ये भी जानता है कि जीवन और मृत्यु से कैसे निबटना है।आलोचना किसी भी व्यक्ति की परिपक्वता और सुधार करने की क्षमता को परखती है।हमारे सबसे अच्छे दोस्त कभी कभी हमारे सबसे बड़े शत्रु हो सकते हैं क्योंकि कभी-कभी वे हमारी कमज़ोरियों के प्रति विचारहीन हो जाते हैं अर्थात् अपनी आँखें मूँद लेते हैं।

हमारे शत्रु हमको ये अवसर देते हैं कि हम दिखा सकें कि हम भी प्रतिकूल और कठोर परिस्थितियों में एक अच्छे और उदार व्यक्ति बन सकते हैं।दुर्भाग्य से हम में से अधिकाँश आलोचना को नकारात्मक रूप से ले लेते हैं और उसी रूप में पलटवार करते हैं।ऐसा करना हमें नुक्सान पहुंचाता है।वास्तव में आलोचना एक कडवी गोली के रूप में आती है और इसे हमें निगलना ही होगा।

जैसा कि विंस्टन चर्चिल ने कहा था,”आलोचना,जरूरी नहीं है कि स्वीकार्य हो,पर ये जरूरी है।ये ठीक उसी प्रकार कार्य करता है जिस प्रकार दर्द हमारे शरीर में करता है।यह चीजों की अस्वास्थ्यकर स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करती है।”

पलटवार करना हमें उस व्यक्ति से बेहतर नहीं बना सकता जो हमें नीचा दिखाने की कोशिश करता है।वो उसी क्षण अपने मकसद में सफल हो जाता है जब हम उसके व्यवहार की नक़ल करने की कोशिश करते हैं।इस प्रकार दोनों में से कोई भी विजयी नहीं होता,दोनों ही हार जाते हैं क्योंकि इस प्रकार की नकारात्मक सोच दोनों को ही और नीचे धकेल देती है।ये ठीक रेत के महल की तरह है जो जो हवा के पहले झोंके से ही ढह सकता है।

हम में से प्रत्येक चाहता है कि उसकी सराहना की जाए और हम में से केवल कुछ ही इस बात से प्यार करते हैं कि उनकी आलोचना हो।हमारे शुभ-चिंतकों द्वारा हम पर प्रशंसा की बौछार किये जाने में कोई बुराई नहीं है।बुराई है कि जब कोई सार्वजनिक रूप से प्रशंसा के बाद फूल कर कुप्पा हो जाता है और उसी में हमारे पतन का पहला कदम छुपा होता है।

नार्मन विन्सेंट पेअले,जो सकारात्मक सोच की शक्ति नामक किताब के लेखक हैं कहते हैं,”हममें से अधिकाँश के साथ समस्या ये है हम आलोचना द्वारा बचाए जाने की बजाय,प्रशंसा से तबाह हो जाते हैं।”

वो व्यक्ति जो आलोचना से बचने की कोशिश करता है,वो वह व्यक्ति होता है जो किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से भागने की कोशिश करता है।वह कुछ नहीं कहता और कुछ नहीं करता और जैसा कि किसी ने कहा है वो कुछ भी नहीं बनता।

बजाय पलटवार करने के या आलोचना से बचने के हमें सकारात्मक सोचना चाहिए और आशावादी बने रहना चाहिए।हमें अपने अन्दर की कमियों को भी दूर करने का प्रयास करना चाहिए जिससे हम और भी बेहतर व्यक्ति के रूप में उभर कर आ सकते हैं।

हमें ये याद रखना होगा कि यदि हम सोचेंगे कि हम हरा दिए गए हैं तो हम हरा दिए गए हैं।यदि हम सोचेंगे कि हम हिम्मत नहीं कर सकते,तो हम नहीं कर सकते।हम जीतना चाहते हैं पर सोचते हैं कि जीत नहीं सकते तो हम कभी भी जीत नहीं पायेंगे।क्योंकि सफलता शुरू होती है हमारी इच्छाशक्ति से और निर्भर करती है हमारे दिमाग की अवस्था पर।

ये सच है कि जब कोई हमारी आलोचना करता है या हम स्वयं को समस्याओं के महासागर में डूबा हुआ पाते हैं तो ये हमारे लिए बहुत ही निराशाजनक भावना होती है।हमें अपना संसार खोया हुआ महसूस होता है और हम स्वयं को जीवन की सड़क पर,बिना किसी उद्देश्य के आवारा भटकते हुए पाते हैं।हम किसी की आलोचना से खुद को नकारा समझने लगते हैं और अपने ऊपर आई समस्याओं की वजह अपने नकारेपन को मानने लगते हैं।ऐसे समय में हमें चाहिए कि हम कभी भी हार न मानें।

ये जानना कितना अद्भुत है कि आशा की एक छोटी सी किरण किसी भी परिस्थिति को विशिष्ट रूप से बदल सकती है।अपनी समस्याओं के प्रति आशावादी सोच,हमारे आत्म-विश्वास का पुनर्निर्माण करती है और हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करती है।

हम फिर से शुरुआत करते हैं और पाते हैं कि अभी बहुत सी संभावनाएँ बची हुई हैं।सकारात्मक सोच हमें प्रत्येक रेत के जाल के पास हरी घास अर्थात् आशा की एक किरण,खोजने में सक्षम बनाती है।ये हमें सक्षम बनाती है कि हम अपना चेहरा सूरज की रौशनी की ओर रखें अर्थात् आशावादी रहें और परछाईयों को अर्थात् निराशा को अपने साहस को उत्साहहीन न करने दें।

सकारात्मक सोच हमें प्रेरित करती है कि हम आस्था,विश्वास और आशावाद के प्रकाश को बरकरार रखें और आगे बढाते रहें।हम सभी में इच्छा शक्ति है,सामर्थ्य है,उत्साह और जुनून है कि हम बिना थके,हमारे कार्यों में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए,प्रयास करते रहें।हमें केवल इस बात की आवश्यकता है कि हम अपनी उन क्षमताओं का एहसास कर सकें,जो हमें अपने रवैये को सकारात्मक रखने से प्राप्त होती हैं।

अत: आलोचना से दुखी हुए बगैर या पलटवार की सोचे बगैर या समस्याओं से हताश और निराश हुए बगैर,हमें अपने आप पर विश्वास रखना चाहिए और अपने साहस और उत्साह को ये कह कर बढ़ाते रहना चाहिए कि यदि मेरे पास इच्छा-शक्ति है तो मैं हमेशा एक विजेता बन कर ही उभरूंगा।

क्योंकि यदि हम आलोचनाओं और समस्याओं से व्यथित हुए बिना केवल ये सोचेंगे कि हम कर सकते हैं,तो यकीनन वो काम हम कर सकेंगे और विजयी हो कर उभरेंगे।