औरों के लिए जीना :-

सच्ची ख़ुशी का माधुर्य चखने के लिए औरों के लिए जीवन जीयें :

कोई किस प्रकार खुश  रह सकता है ?अक्सर ये प्रश्न दिमाग में कोंधता रहता है और हम सब इसका उत्तर खोजते रहते हैं,पर इसका उत्तर बाहर नहीं अपितु वास्तव में हमारे भीतर ही है।हर व्यक्ति के लिए ख़ुशी के अलग-अलग अर्थ हैं।कुछ लोगों के लिए केवल भौतिक ख़ुशी ही मायने रखती है,लेकिन वास्तविक ख़ुशी जो हर कोई खोज रहा होता है वो अभौतिक होती है,क्योंकि ये ये तभी प्राप्त होती है जब कोई अपना १०० प्रतिशत,जो कुछ भी वो करता है,उसमें देने का इच्छुक होता है।

ये तब प्राप्त होती है जब हम दूसरों के लिए जीते हैं,और अपने प्यार की खुशबू फैलाते हैं,उन लोगों को उत्साहित करते हैं जो आशा खो चुके होते हैं,और उदाहरण बनते हुए औरों के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होते हैं।केवल इस तरीके से ही हम सच्ची ख़ुशी का स्वाद चख सकते हैं।

 मानवता के लिए सच्ची सेवा अर्थात् औरों के लिए जीना अनुग्रह का एक स्पर्श हो जाता है:

शहंशाह अकबर अक्सर तानसेन से पूछते थे क्या कोई उससे भी बड़ा संगीतज्ञ है।तानसेन ज्यादातर इस प्रश्न को टाल जाते थे।लेकिन एक दिन अकबर ने जोर दिया तब तानसेन को बताना पड़ा कि उससे भी बड़े संगीतकार स्वामी हरिदास हैं और वो उन के सामने कुछ भी नहीं है।

इस पर उत्साहित शहंशाह अकबर ने आदेश दिया कि स्वामी हरिदास को तुरंत दरबार में हाजिर किया जाए,क्योंकि मैं उनका गाना सुनना चाहता हूँ।लेकिन ये सभी को पता था कि स्वामी हरिदास कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं।वो एक भक्त थे और केवल अपने भगवान् के लिए ही गाते थे और कभी वृन्दावन छोड कर नहीं जाते थे।

लेकिन अकबर उनको सुनने के लिए बड़ा लालायित था।तब तानसेन ने उनको सलाह दी कि वे गुप्त रूप से जायेंगे और झाड़ियों के पीछे छुप कर ४ बजे प्रातः मंदिर में जब वो गायेंगे तो उनका गाना सुन लेंगे।

अकबर उनको गाते सुनने के लिए इतना इच्छुक था कि उसने वैसा ही किया जैसा तानसेन ने कहा था।एक सुबह वो मंदिर के पास झाड़ियों में छुप गए।ठीक ४ बजे स्वामी हरिदास ने गाना शुरू किया।तत्काल ही शहंशाह समाधिस्थ सा हो गया और तानसेन को उसको याद दिलाना पड़ा कि उनको तुरंत ही उसी प्रकार गुप्त रूप से वापस लौट जाना चाहिए,जैसे वो आये थे।

भौर होने को थी।वापस पहुँचने पर अकबर ने कहा,”तानसेन तुम ठीक कहते थे।उनका गायन दिव्य था और तुम तुलनात्मक रूप से उनसे कहीं पीछे हो।ऐसा किस प्रकार है ?तानसेन ने उत्तर दिया,”सबसे ज्यादा दयालु शहंशाह,अंतर केवल यही है कि स्वामी हरिदास भगवान् के लिए गाते हैं और मैं आपके लिए।चाहे आप कितने ही ऊंचे क्यूँ न हों,आप केवल एक मानव हैं।”

अकबर को बात समझ में आ गयी।उसने कहा ,”ये मेरी इच्छा है कि जब तुम मेरी मौजूदगी में गाओ तब ये भूल जाओ कि तुम मेरे लिए गा रहे हो।ऐसा सोचना कि तुम केवल उस सर्वशक्तिमान के लिए ही गा रहे हो।

”और ये कहा जाता है कि तब से ही तानसेन की आवाज में एक दिव्यता आ गयी।ये सच है कि कुछ भी भगवान् को अर्पण करने के लिए या मानवता की सच्ची सेवा के लिए किया जाए तो उस प्रयास में लावण्यता और दिव्यता  का स्पर्श आ ही जाता है।