कष्ट एवम् दोष –कारण व निवारण :-

संसार में तीन तरह की वस्तुएँ हैं –आत्मा ,परमात्मा और अनात्मा।हम सब आत्मा हैं और जगत के सब जड़ पदार्थ अनात्मा हैं।वस्तुतः हम समझते हैं कि जब अनात्मा पदार्थ हमारे अनुकूल होते हैं तब हमें सुख की प्राप्ति होती है।यह संसार तथा इसके पदार्थ स्थिर नहीं हैं ,नश्वर हैं और चंचल भी हैं।सांसारिक पदार्थ भौतिक या दैहिक सुख तो दे सकते हैं किन्तु आत्मिक सुख नहीं।दो समान वस्तुओं का सम्बन्ध ही सुखदाता होता है और विषम वस्तुओं का सम्बन्ध दुखदायी होता है। अनात्मा पदार्थों और हमारे बीच विषमता है ,जबकि हमारे और परमात्मा के बीच साम्यता है।

अन्त:करण की वृत्तियों के दो भोक्ता हैं।एक है काम,क्रोध और लोभ आदि और दूसरी ओर है ईश्वर स्मरण।एक समय में एक ही भोक्ता वृत्तियों को भोग सकता है।यदि काम,क्रोध,लोभ अंत:करण में हैं तो ईश्वर में वृत्ति नहीं लगेगी।और इस जन्म में तो क्या लाखों जन्मों में भी ईश्वर को प्राप्त किये बिना मनुष्य को इस संसार में सुख नहीं प्राप्त हो सकता।

सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलु हैं।दुःख का अभाव ही सुख है।सुख और दुःख किसी वस्तु में नहीं है।जिस भोजन से हमारे प्राणों का पोषण होता है वही कुपथ होने पर बीमारी भी लाता है और विष भी हो जाता है।प्यासे व्यक्ति को जल तृप्ति देता है पर जल में डूबने लगें तो पानी दुःख हो जाता है।

प्रत्येक पदार्थ प्रकृति के नियम के आधीन काम करता है,उसमें अनुकूलता ढूंढनी चाहिए क्योंकि अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता ही दुःख है।मन का स्वभाव है जितना विकेन्द्रित होगा उतना ही दुःख होगा और जितना ही केन्द्रित होगा उतना ही सुख होगा।दुर्बल मन ही दुखों को जन्म देता है।मानसिक विषमता ही दुःख है।

मन की एकाग्रता ही उसे हटाने का साधन है क्योंकि उससे मन को समता प्राप्त होती है।दुःख को हम अवांछनीय कहकर उससे भागते हैं और जितना हम भागते हैं उतना ही वह हमारा पीछा करता है।किसी कारण से यदि वह हमें छोड जाए तो हमारा विकासक्रम रुक जाता है।दुःख की भांति सुख का मूल भी तृष्णा है।जो पुरुषार्थ हम इस तृष्णापूर्ति के लिए करते हैं ,वही हमें ज्ञान तथा नयी शक्ति देता है।यदि सुख की इच्छा को मन से निकाल दें तो हम पशुवत हो जायंगे। परन्तु सुख के पीछे भागने से सुख पाकर भी आनंद नहीं पाया जा सकता।दुःख धैर्य की कसौटी है तो सुख मानवता की परीक्षा है।

शरीर के द्वारा ही धर्म –अधर्म होता है और धर्म-अधर्म से ही सुख-दुःख होता है।सुख-दुःख शरीर ही भोगता है ,आत्मा इस सबसे परे है।मन जब तक देह के विकारों में रमा रहता है ,निर्विकार आत्मा की ओर उसकी गति नहीं होती।जब मन ज्ञान के आधीन हो जाता है ,तब उसकी आत्मा की ओर गति होती है और जीव सत्-चित्त आनंद स्वरुप हो जाता है।सृष्टि का मूल मन है।व्यक्ति का मन अथवा चित्त जैसी इच्छा-कामना करता है ,उसे वैसा ही प्राप्त होता है।जैसी मन की स्थिति होती है ,शरीर वैसा ही व्यवहार करने लगता है।

 प्रेम ,द्वेष ,भक्ति,चिंता,स्मरण,आदि क्रियाएँ केवल मन के विषय हैं अर्थात् मन ही व्यक्ति के शरीर तथा व्यवहार को नियंत्रित करता है।मन के तीन रंग हैं-एक है काला जिसका काम केवल दूसरों को दुःख पहुँचाना है ,दूसरा है सुरा ,जिसका काम कामना भोग और प्रभुता है अर्थात् खुद शक्तिशाली हो कर दूसरों को अपने बस में रखना  और तीसरा रंग उज्जवल और परम शांत है।

दुःख अभाव से होता है।जब तृष्णा ,कामना आदि की अधिकता हो जाती है तो दुःख होता है।कामनाओं का त्याग तथा वैराग्य इस लोक में सुख है।आकांक्षा सुख और दुःख का संगम है ,अशांति का पर्याय है परन्तु यह पाप नहीं है।आकांक्षा और शांति की कामना एक साथ नहीं की जा सकती।कामना दुःख का द्वार है।सुख की कामना ही दुःख का कारण है।दुख से छुटना है तो कामना को त्याग दो।शान्ति का एक ही मार्ग है –कामना का त्याग।शान्ति की इच्छा के लिए दुःख के साथ सुख का त्याग भी आवश्यक है।मन की कामनाओं का विनाश ही महासुख है।सुख और दुःख बारी-बारी से आते हैं अत: विचारवान पुरूष को दुःख भी नहीं मानना चाहिए और सुख भी नहीं।

सच्चा सुख और शांति आंतरिक संतोष में है।इसके लिए मनुष्य को भोग के स्थान पर त्याग को अपनाना चाहिए ,बाह्य पदार्थों में सुख खोजने के बदले उसे आत्मतुष्टि में पाना चाहिए।जब तक मनुष्य बाह्य पदार्थों के संग्रह और भोग में सुख मानता रहेगा ,उसकी सारी शक्ति उनके उपार्जन में लगी रहेगी और ऐसे में वह औरों के समानाधिकार और व्यवहार में समानता को स्वीकार नहीं करेगा।सुख और भोग दो अलग स्थितियाँ हैं। सुख एक मानसिक स्थिति है जो भोग के अभाव में भी संभव है और भोग पूर्णतया दैहिक स्थिति है।

शायद अधिक सत्य यही है कि सुख भोग के अभाव में ही संभव है भोग से कभी किसी ने सुख नहीं पाया।वह तो दुःख क प्रवेश द्वार है।ग्यानी महापुरुषों ने कहा है कि इच्छाओं का,कामनाओं का त्याग कर मन को निर्विचार बनाओ।जब मन में कोई विचार नहीं होगा तो इच्छाओं पर नियंत्रण होगा और आसक्ति का विनाश होगा।जब आसक्ति का नाश हो जाएगा तो वह सुख-दुःख की प्रवृतियों से बच सकेगा।अत: मन को निर्विकार बनाना ही सुख-दुःख के बन्धनों से मुक्त होना है।इन्द्रिय जनित विषय-वासनाओं से वशीभूत और मोह में डूबा हुआ मन व्यक्ति को अपना दास बना लेता है और व्यक्ति सांसारिक बन्धनों में बांध जाता है।आसक्ति ही बंधन है और अनासक्ति मोक्ष का मार्ग है।जब व्यक्ति के मन में सोच विचार न हो ,सुख-दुःख का अनुभव न हो ,कुछ मिलने पर प्रसन्नता न हो ,कुछ खो जाने पर शोक न हो तब कह सकते हैं कि व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर हो रहा है।

मन पर नियंत्रण करने के लिए उसे शुभ संकल्प युक्त अर्थात् ईश्वर प्राप्ति का संकल्प युक्त बनाना होगा।साथ ही साथ यह भी समझना होगा कि यह देह और इन्द्रियजनित सुख,भोग विलास की वस्तुएँ वह सब क्षणिक हैं।इस प्रकार देह्बोध को नकारते हुए ,आसक्ति को समाप्त करे हुए निर्लिप्त होने का प्रयत्न करें।साथ ही साथ ईष्ट और गुरू के चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव रखो।क्योंकि जब समर्पण हो जाता है तो लगाव या आसक्ति नहीं रहती।

चित्त और मन एक वस्तु नहीं हैं।चित्त ही मूल अन्त:करण है।सत्त्व एवम् तमोगुण को दबाकर जब रजोगुण प्रधान हो उठता है तब इसे मन की आख्या प्राप्त होती है।जब तमोगुण की प्रधानता हो तो यही चित्त अहंकार बन जाता है।और जब इस चित्त में रज और तम अभिभूत हो जाते हैं तब यह सत्त्व-प्रधान अंत :करण बुद्धि के नाम से जाना जाता है।सुख और दुःख चित्तरूपी मूल अंत:करण के द्वारा शरीर की भिन्न इन्द्रीयों  द्वारा भोग जाता है।सच्चा सुख अथवा आनंद, कामना त्याग में है।कष्ट अथवा दुःख, चित्त के रजोगुण अथवा तमोगुण में हो जाने के कारण अनुभव होते हैं।इस चित्त की स्थिरता के लिए मैत्री,करुणा,मुदिता और अपेक्षा चार उपाय बताये गए हैं ,पर चित्त शुद्धि के सरल उपाय वस्तुतः नामजप,ध्यान और स्तुतिपाठ आदि भी हैं।

वस्तुतः चित्त की स्थिरता से ही आसक्ति का नाश होता है जो हर कष्टों की जनक होती है।