किसी के द्वारा अनिष्ट हो जाए तो उसके लिए दुखी न हों और न ही  किसी के अनिष्ट की भावना ही करो:-

कभी –कभी किसी के द्वारा जाने –अनजाने तुम्हारा कभी कोई अनिष्ट हो जाए तो उसके लिए दुखी होने की जरूरत नहीं है। हो सकता है ये तुम्हारे पहले किये हुए बुरे कर्मों का फल हो।इसलिए यह विचार कभी मन में मत आने दो कि अमुख ने मेरा अनिष्ट कर दिया है।ध्यान रखो भगवान् के दरबार में कभी अन्याय नहीं होता ,तुम्हारा जो अनिष्ट हुआ है ,या तुम पर जो विपत्ति आई है ,वह अवश्य ही तुम्हारे पूर्वकृत कर्मों का फल है।

वास्तव में बिना कारण कोई तुम्हे कदापि कष्ट नहीं पहुंचा सकता।न ही यह संभव है कि कार्य पहले हो और कारण पीछे बने। इसलिए तुम्हे जो कुछ भी दुःख प्राप्त होता है ,सो अवश्य ही तुम्हारे अपने कर्मों का फल है।ईश्वर तो तुम्हें पापमुक्त करने के लिए दयावश न्यायपूर्वक फल का विधान करता है।जिसके द्वारा तुम्हे दुःख पहुंचा है ,वह तो केवल निमित्त है।वह बेचारा अज्ञान और मोहवश निमित्त बन गया है ,उसने तो अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और तुम्हे कष्ट पहुँचाने में निमित्त बन कर अपने लिए दुखो को निमंत्रण दिया है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जो स्वयं दुखों को बुलाता है ,वह बुद्धिमान नहीं है ,भुला हुआ है ,इसलिए वह दया का पात्र है इसलिए  उस पर क्रोध न करो ,बदलें में उसका बुरा न चाहो ,कभी उसकी अनिष्ट कामना न करो बल्कि भगवान् से प्रार्थना करो कि हे भगवान ! इस भूले हुए जीव को सन्मार्ग पर चढ़ा दो।इसकी सद्बुद्धि को जागृत कर दो इसका भ्रमवश किया हुआ अपराध क्षमा करो।

संभव है उससे किसी परिस्थति में पड़ कर भ्रम से ऐसा काम बन गया हो ,जिससे तुम्हे कष्ट पहुंचा हो ,परन्तु अब वह अपने किये पर पछताता हो ,उसके हृदय में पश्चाताप की आग जल रही हो और वह संकोच में पड़ा हुआ हो ,ऐसी अवस्था में तम्हारा कर्तव्य है कि उसके साथ प्रेम करो ,अच्छे से अच्छा व्यवहार करो और उससे स्पष्ट कह दो कि भाई !,तुम पश्चाताप क्यूँ कर रहे हो ?तुम्हारा इसमें दोष ही क्या है ?मुझे जो कष्ट प्राप्त हुआ है सो मेरे पूर्वकृत कर्म का फल है।तुमने तो मेरा उपकार किया है जो मुझे मेरा कर्मफल भुगतने में कारण बने हो ,संकोच छोड दो।तुम्हारे सच्चे हृदय की इन सच्ची बातों से उसके हृदय की आग बुझ जायेगी ,वह चेतेगा ,आइन्दा किसी का बुरा नहीं करेगा।

और यदि वास्तव में कुबुद्धि वश उसने जान कर ही तुम्हे कष्ट पहुँचाया होगा और इस बात से उसके मन में पश्चाताप के बदले आनंद होता होगा तो तुम्हारे अच्छे बर्ताव और प्रेम व्यवहार से उसके हृदय में पश्चाताप उत्पन्न होगा ,तुम्हारी महत्ता के आगे उसका सर आप ही झुक जाएगा और उसका हृदय पवित्र हो जाएगा।यह निश्चय है। कदाचित ऐसा न हो तो भी तुम्हारा कोई हर्ज नहीं ,तुम्हारा अपना मन तो सुन्दर प्रेम के व्यवहार से शुद्ध और शीतल रहेगा ही।

उसके प्रति द्वेष कभी न करो क्योंकि यदि द्वेष करोगे तो तुम्हारे मन में बैर ,हिंसा आदि अनेक नए-नए पापों के संस्कार पैदा हो जायेंगे और  उसका मन भी शुद्ध नहीं रहेगा।उसमें पहले वैर न रहा होगा तो तुम्हारे ऐसे व्यवहार से पैदा हो जाएगा।द्वेषाग्नि से दोनों क हृदय जलेगा ,बैर भावना परस्पर दोनों को दुखी करेगी।अत: इस बात को सर्वथा भूल जाओ कि अमुख ने कभी मेरा कोई अनिष्ट किया है।

इसी प्रकार यदि तुम्हारे द्वारा किसी प्राणी का कभी कुछ भी अनिष्ट हो जाए या उसे दुःख पहुँच जाए तो इसके लिए बहुत ही पश्चाताप करो। यह ख्याल मत करो कि उसके भाग्य में तो दुःख बदा ही था ,मैं तो निमित्त मात्र हूँ ,मैं निमित्त न बनता तो उसको कर्मों का फल ही कैसे मिलता ,उसके भाग्य से ही ऐसा हुआ है ,मेरा इसमें क्या दोष है ,उसके भाग्य में जो कुछ भी हो इससे तुम्हे मतलब नहीं। तुम्हारे लिए ईश्वर और शास्त्र की यही आज्ञा है कि तुम किसी का अनिष्ट न करो।तुम किसी का बुरा करते हो तो अपराध करते हो और इसका दंड तुम्हे अवश्य भोगना पड़ेगा।उसके कर्मफल भुगताने के लिए ईश्वर आप ही कोई दूसरा निमित्त बनाते ,तुमने निमित्त बनकर पाप का बोझ क्यूँ उठाया ?

याद रखो कि तुम्हे जब दूसरे के द्वारा जरा सा भी कष्ट मिलता है तब तुम्हे कितना दुःख होता है ,इसी प्रकार उसे भी होता है।इसलिए कभी भूलकर भी किसी के अनिष्ट की भावना ही न करो।ईश्वर से सदा यह प्रार्थना करते रहो कि ,”हे भगवन ! मुझे ऐसी सद्बुद्धि दो जिससे मैं तुम्हारी सृष्टि में तुम्हारी किसी भी संतान का अनिष्ट करने या उसे दुःख पहुंचाने में कारण न बनूँ।”

सदैव सबकी सच्ची हित –कामना करो और यथासाध्य सेवा करने की वृति रखो कोढ़ी,अपाहिज ,दुखी-दरिद्र को देखकर यह समझकर कि यह अपने बुरे कर्मों का फल भोग रहा है ,जैसा किया था वैसा ही पाता है ‘-उसकी उपेक्षा न करो ,उससे घृणा न करो और रूखा व्यवहार करके उसे कभी कष्ट न पहुँचाओ। वह चाहे पूर्व का कितना ही पापी क्यूँ न हो ,तुम्हारा काम उसके पाप देखना नहीं है। तुम्हारा कर्तव्य तो अपनी शक्ति के अनुसार उसकी भलाई करना तथा उसकी सेवा करना ही है।यही भगवान् की तुम्हारे प्रति आज्ञा है।यह न कर सको तो कम-से कम इतना तो जरूर ख्याल रखो जिससे तुम्हारे द्वारा न तो किसी को कुछ भी कष्ट पहुंचे और न किसी का अनिष्ट ही हो।तुम किसी से घृणा करके उसे दुःख पहुंचाते हो तो पाप करते हो ,जिसका बुरा फल तुम्हे जरूर भोगना पड़ेगा।

यदि कभी किसी जीव को तुम्हारे द्वारा कुछ भी कष्ट पहुँच जाए तो उससे क्षमा मांगो,अभिमान छोड़कर उसके सामने हाथ जोड़कर उससे दया-भिक्षा चाहो ,हजार आदमियों के सामने भी अपना अपराध स्वीकार करने में संकोच न करो ,परिस्थिति बदल जाने पर भी अपनी बात न बदलो ,उसे सुख पहुंचा कर उसकी सेवा कर के अपने प्रति उसके हृदय में सहानुभूति और प्रेम उत्पन्न कराओ।

यह ख्याल मत करो कि कोई मेरा क्या कर सकता है ?मैं सब तरह से बलवान हूँ ,धन विद्या ,पद आदि के कारण बड़ा हूँ। वह कमजोर अशक्त मेरा क्या बिगाड़ सकेगा ?ईश्वर के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। वहां के न्याय पर तुम्हारे धन,विद्या और पदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कमजोर-गरीब की दुःख भरी आह तुम्हारे अभिमान को चूर्ण करने में समर्थ होगी।तुम्हारे द्वारा दुसरे के अनिष्ट होने की छोटी से छोटी घटना भी तुम्हारे हृदय में सदा शूल की तरह चुभनी चाहिए ,तभी तुम्हारा हृदय शीतल होगा और तुम पापमुक्त हो सकोगे।