गुरू को प्राप्त करने के लिए जरूरी लक्षण:- 

मानव बन कर मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए सद्गगुरू के पास जाना चाहिए। पर गुरू को जाना कैसे जाये ?सद्गगुरू की प्राप्ति के लिए मानव के अंदर भी कुछ लक्षण होने चाहिएँ या विकसित किये जाने चाहिएँ।
शरीरश्रमी :                                                                                                          ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ‘अर्थात्  स्वस्थ शरीर ही साधना का श्रेष्ठ स्थान है। शरीर  से जीवात्मा अस्तित्व है। बिना शरीर के ,परमात्मा के हित चिंतन  में कोई भी कार्य नहीं हो सकते हैं। अष्टांग योग के सभी नियम पहले शरीर ,मन और वाणी से सम्बन्ध रखते हैं। अतः हमें कभी भी समाप्त होने वाला मानकर परमात्मा तथा समाज के हित के लिए हर क्षण समर्पित करने के संकल्प के साथ साधना मे लगा देना चाहिए। क्यूंकि मात्र शरीर को मोटा-ताज़ा बनाना ,शारीरिक व्यायाम की क्रियाओं द्वारा सबल बनाना ही काफी नहीं अपितु इसे योग साधना में लगाने का बराबर अभ्यास लगाना चाहिए।
मन संयमी :                                                                                                          दस इंद्रियों के साथ मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। जिस प्रकार रथ पर बैठा सारथी रथ की दिशा को अपने अनुरूप मोड़ देता है ,वैसे ही मन इंद्रियों को काबूकर परमात्मा से विलग इस नाशवान भौतिक संसार में लगाये रखने का प्रयत्न करता है ,जो जीव के हित में नहीं है। मन को संयमित करने के शास्त्रों ,पुराणों व योगाचार्यों ने तमाम मार्ग सुझाये  हैं लेकिन मन को संयमित करने का सरलतम उपाय है -‘वसुधैव कुटुंबकम ‘ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः ‘ अथार्त सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवारीजन मान कर उसके सुखी जीवन की कामना तथा स्वयं को  त्याग भावना बल प्रदान कर ,मन को संयमित बनाया जा सकता है। अतः संसार की संपत्ति ,वैभव व अनेक भौतिक संसाधनों को अपना मान लेना ,मन को एकाग्र करना है।

बुद्धि विचार वाली:                                                                                                अन्तःकरण चतुष्टय में मन के बाद बुद्धि का क्रम है। अतः बुद्धि ही मन को सतर्क करने वाली वस्तु बताई गयी है। मन तो  चंचल है -‘मनः चञ्चल कृष्ण ‘… मन को सांसारिक भोगों से विलग कर ईश्वर आराधना मे लगाना ,बुद्धि का कार्य है। अतः ‘हानि-लाभ ,जीवन-मरण ,यश-अपयश विधि हाथ ‘को सामने रख कर हमें बुद्धि के द्वारा मन को निर्देश देना चाहिये। ‘सहसा करि पाछे पछिताहीं ,कहै वेद बुध ते बुध नाहीं ‘ इसलिए चंचल मन को निरन्तर अभ्यास के द्वारा बुद्धि से नियंत्रित करना चाहिए। जिससे पछतावे के कारण शरीर मे जलन ,ईर्ष्या ,क्रोध का अंकुर न फूटे ,जो हमें सदा सर्वदा नाश की तरफ ले जाता है।

वचन पालन कर्ता :                                                                                                  ‘अभिवादनशीलस्य नित्य वृद्धपसेविन : चत्वरि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम् ‘                          उपरोक्त सुन्दर वाक्य में अभिवादन तथा वृद्ध पुरूषों के साथ अन्य गुणों का विकसित होना तथा परम लक्ष्य की प्राप्ति का साधन बतलाया गया है। शास्त्रों में वर्णित सूत्रों का मानना ही वचन का पालन करना है। चाहे माता-पिता ,गुरू आदि की बातें हो या योगी द्वारा बताये गए साधन। उपरोक्त गुणों के बाद जीवन में सुख,शान्ति  का प्रादुर्भाव होगा और अन्त मे मुक्ति को प्राप्त होगा। उदाहरण के लिए जब महाभारत युद्ध के पश्चात  दुर्योधन स्वर्गारोहण के लिए चला तो युधिष्ठिर नें कृष्ण जी से इसका कारण पुछा। तब उन्होंने बताया कि उसने अपने उस वचन का पालन किया कि ‘युद्ध के बिना सुई की नोंक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा। अतः उसे वचन पालन के कारण स्वर्ग जाने का अवसर मिला।

आस्तिकता :                                                                                                        अगर हमने उपरोक्त चार साधनों के बताये सूत्रों का अनुपालन किया तो सहज ही आस्तिकता का भाव अभ्युदय हो जाएगा। आस्तिकता कोई सुन्दर वस्तु नहीं जिसे खरीदा जा सके अपितु गुणों को ग्रहण कर आस्तिकता के भाव को समझा जा सकता है।