चेतन को महत्व दें :-

हम लोगों की मुख्य भूल है कि जो जड़ है,नाशवान है,परिवर्तनशील है,उसे तो हम सच्चा मान लेते हैं और प्रमुखता देते हैं और जो चेतन है,अविनाशी है,अपरिवर्तनशील है उसे कोई महत्व नहीं देते।हम शरीर को ही प्रमुख मान लेते हैं।शरीर का ही आदर करते हैं।शरीर की निंदा हमसे बर्दाश्त नहीं होती।इस प्रकार इस नश्वर शरीर को ही मुख्य मान कर चलने लगे और जो चेतन है उस भगवान् को हम भूल गए।

हमारा शरीर नित्य परिवर्तनशील है।कभी हम छोटे थे,फिर बड़े हो गए फिर एक दिन बूढ़े हो जायेंगे फिर भी इस बात में ही पड़े रहते हैं और शरीर की ही बात करते रहते हैं कि हम छोटे हो गए,हम बड़े हो गए,हम स्वस्थ हो गए,हम बीमार पड गए,हमारा आदर हो गया,हमारा निरादर हो गया।

हमारा नाम और रूप दोनों बदलने वाले हैं,मिटने वाले हैं ध्यान दीजिये कि हमारे पास जितनी भी वस्तुएँ हैं,वे पहले हमारी नहीं थीं,पीछे हमारी नहीं रहेंगी और इस समय भी हमसे प्रतिक्षण अलग हो रही हैं।जितने भी शरीर हैं सब अन्तवान ,नाशवान हैं।परन्तु जो सब जगह विद्यमान है उसे हम आदर नहीं देते।

मुख्यता स्वयं की रहनी चाहिए।मुक्ति भी स्वयं की होती है,शरीर की नहीं।जब हम शरीर को अपना मानते हैं तो उसके बंधन में पड़ जाते हैं जब हम शरीर का मोह छोड देते हैं तो हम स्वतंत्र हो जाते हैं,मुक्त हो जाते हैं।

एक चींटी मिश्री के पहाड़ पर रहती थी और एक नमक के पहाड़ पर रहती थी।मिश्री के पहाड़ वाली चींटी,नमक के पहाड़ वाली चींटी से बोली,”मेरे साथ चल ,क्योंकि मेरे वहाँ मिठास है।”तब नमक के पहाड़ वाली चींटी बोली क्या वहाँ इससे भी बढ़िया मिठास है।”मिश्री के पहाड़ वाली चींटी उसे अपने साथ मिश्री के पहाड़ पर ले गयी और कहा देखो यहाँ कितनी मिठास है।पर नमक वाली चींटी को कोई फर्क नजर नहीं आया क्योंकि उसने मुख में नमक की डाली पकड़ रखी थी।अब उसको दूसरा स्वाद कैसे आता।जब उसने मुख से वो डाली निकाल कर मिश्री चखी तो फिर उसे पता चला कि असली मिठास कहाँ है।

इसी प्रकार,हम भी नमक की डली जैसे इस शरीर को पकडे रहते हैं और सोचते हैं कि जो हमारे शरीर के साथ होता है केवल वही सच्चा है।शरीर का आराम सच्चा है,शरीर का मान –अपमान सच्चा है।और ऐसी मान्यता रखते हुए सत्संग करते हैं।वास्तव में ये सत्संग नहीं है बल्कि कुसंग है।

जब हम किसी चीज को मानने लगते हैं तो उस के बारे में शंका नहीं करते,जैसे जब हम अपने नाम को मान लेते हैं तो फिर उस के बारे में प्रश्न नहीं करते कि हमारा नाम ये क्यों है और किस कारण से है।उसी प्रकार जब हम यह सोचने लगते हैं कि मैं शरीर हूँ और इस बात पर दृढ विश्वास करने लगते हैं,मान्यता बना लेते हैं तो फिर मान,बड़ाई ,निरादर आदि जो कुछ भी है,वह हमारा कैसे हो रहा है,यह शंका ही नहीं रहती।यदि हम इस के बजाय ये मान लें कि हम भगवान् के हैं और भगवान् हमारे तो हम मोक्ष को प्राप्त हो जाएँ।

अगर हम ये मानने लगें कि शरीर तो नश्वर है,उसका क्या आदर,क्या निरादर,और सही बात को सही मान लें कि भगवान् ही सत्य है तो सब ठीक हो जाएगा।