जानने योग्य बातें :-
इन पाँच बातों का त्याग ज्ञानी और भक्त सभी साधकों को करना चाहिए :

हमें प्रथम व्यर्थ चिंतन,द्वितीय व्यर्थ भाषण त्रितीय व्यर्थ दर्शन चतुर्थ व्यर्थ श्रवण और पंचम व्यर्थ भ्रमण से बचना चाहिए और इनका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इन व्यर्थ की बातों में समय नष्ट होता है और हमारे ज्ञान और भक्ति में कमी आती है।

भगवान् के नामस्मरण,भगवल्लीलाओं के स्मरण और भगवत्स्वरूप के स्मरण से व्यर्थ चिंतन दूर होता है।भगवद् गुणानुवाद और भगवन्नामकीर्तन से व्यर्थ भाषण निवृत्त  होता है।भगवन्नमूर्ति,महात्मा और गुरूदेव के दर्शन करने से व्यर्थ दर्शन दूर होता है।भगवत्कथा श्रवण से व्यर्थ श्रवण की निवृति होती है और भगवत्सेवा और भक्तजनों  की सेवा करने से व्यर्थ भ्रमण निवृत्त  होता है।

जीव के प्रधान शत्रु और त्यागने योग्य वृत्तियाँ  हैं :

हमारे जीवन में वक्त –बेवक्त कई अवगुण आ जाते हैं जैसे १)काम;२)क्रोध ;३)लोभ ;४) मोह ;५)मत्सर और ६)मद् ये सारे अवगुण हमारे परम शत्रु हैं और हमें पतन के गर्त में गिरा देते हैं इसलिए हमें इनका त्याग कर देना चाहिए।ये अवगुण हमारे  ज्ञान ,भक्ति,वैराग्य आदि सभी को नष्ट कर देते हैं ,अतः इनसे सर्वदा बचना चाहिए। कहा भी है -काम बिगाडे भक्ति को ,ज्ञान बिगाड़े क्रोध। लोभ विराग बिगाडहिं ,मोह बिगाडे बोध।।

हम इन अवगुणों से निजात पा सकते हैं।हम काम की निवृति उपासना से ,क्रोध की निवृति सत्संग से,मोह की निवृति एकांतवास से,लोभ की निवृति त्याग से,मत्सर की निवृति किये हुए कर्मों को ईश्वरार्पण करने से और मद की निवृति भिक्षा वृत्ति से कर सकते हैं।

इन छह बातों को त्यागने से सत्त्वगुण की वृद्धि हो सकती है :

जब हम अधिक सोते हैं,अधिक बोलते हैं,अधिक खाते हैं,विशेष भोगों में लगे रहते हैं,साँसारिक पुरूषों से प्रेम करते हैं या आपस में बेवजह हँसी-मज़ाक करते हैं तो हमारे अन्दर तामसिक गुणों का संचार होने लगता है।हम विषय –भोगों द्वारा मोहित हुए प्रभु भक्ति से मुँह चुराने लगते हैं और पतन के शिकार हो जाते हैं।वहीँ जब हम किसी भी चीज की अति नहीं करते और सब कुछ अल्प मात्र में करते हैं तो हमारे अन्दर एक ठहराव आ जाता है जिसके कारण हममें सत्व्गुनों की वृद्धि होने लगती है।

चार प्रकार की चंचलताओं का त्याग करो :

हमारे जीवन में हम कभी न कभी चार प्रकार की चंचलताओं का आगमन होता है जिनमें सर्वप्रथम है वाकचंचलता अर्थात् जोर से बोलना ,अधिक बोलना अथवा बिना प्रयोजन बोलना,दूसरी है नेत्रचंचलता अर्थात् इधर-उधर या ऊपर -नीचे देखना,तीसरी है हस्तचंचलता अर्थात् तिनका तोड़ना या पृथ्वी पर लिखना,अनर्गल लिखना और चौथी है पादचंचलता अर्थात् पैर हिलाना अथवा बेढंगे ढंग से चलना।

उपरोक्त चञ्चलताएँ(वाणी,नेत्र,हाथ,पैरों की चंचलता)मूर्खता का लक्षण हैं। इनमें से एक भी होना मूर्खता का चिन्ह है। जिनमें चारों हों वह तो महामूर्ख है।  अतः उपरोक्त चारों चञ्चलताओं का त्याग करो।

चित्त छः जगह फँस जाता है :

हमारा चित्त बड़ा ही चलायमान होता है।ये इन्द्रियों के वशीभूत हो कर इन छह जगहों में फंस जाता है।हमारा चित्त सर्वप्रथम भोजन ,फिर वस्त्र ,धन ,स्त्री ,स्थान और शास्त्र के चंगुल में फंस जाता है।

चित्त मुख्य रूप से प्रथम चार और गौण रूप से अंतिम दो जगह में फंस जाता है।जब व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भोजन करता है या कोई भोजन जो उसे अच्छा लगता है तो वो उसका गुलाम हो जाता है।इसी प्रकार व्यक्ति धन,वस्त्र स्त्री का भी गुलाम हो सकता है और इनका लालच दे कर उससे कोई भी काम कराया जा सकता है।व्यक्ति किसी स्थान का भी लालच कर सकता है।जब व्यक्ति लालची हो जाता है तो उसका विश्वास कैसे किया जा सकता है।

केवल ऐसे व्यक्ति का जिसका चित्त उपरोक्त छः स्थान में न फँसे उस पर विश्वास किया जा सकता है।इसलिए कोशिश कर कर अपने चित्त को उपरोक्त छ: जगहों से दूर रखना चाहिए।

मन के तीन दोष मुख्य हैं :

मन के तीन दोष होते हैं तृष्णा ,द्वेष और क्रोध।जब हम तरह-तरह के तुच्छ विषयों की आशा रखते हैं तो इसे तृष्णा कहते हैं।काम से तृष्णा  होती है ,तृष्णा को ही लोभ कहते हैं और लोभ से ही इच्छा होती है तथा इच्छा में विघ्न पड़ने पर ही क्रोध आता है।जब हम दूसरे के दोषों,अवगुणों को देखते,सुनते,कहते या चिंतन करते हैं तो यही द्वेष का कारण होता है और जब हमारी किसी इच्छा में व्याघात होता है तो ऐसा होने से क्रोध होता है।द्वेष भी क्रोध का कारण है। किसी की हानि करानी हो तो उसे क्रोध करा दो। क्रोध से तप नष्ट हो जाता है।

उपरोक्त दोषों से छूटने का यथा संभव प्रयास करना चाहिए।  तृष्णा से बचने का उपाय है कि निरिच्छ बना जाए। द्वेष से बचने के लिए परचर्चा का त्याग करो। दूसरों के गुण और दोष दोनों पर दृष्टि न रखो और इसके प्रति उदासीन रहो।क्योंकि जिस विषय का चिंतन किया जाता है मनुष्य वैसा ही हो जाता है। अतः किसी की निंदा या पाप का चिंतन नहीं करना चाहिए।  आशा ,दोष-दृष्टि और इच्छाओं के त्याग से उपरोक्त दोषों का त्याग हो सकता है।

माँगने से पाँच चीजें चली जाती हैं:

जब हम किसी से कुछ मांगते हैं तो सर्वप्रथम-ह्री(लज्जा), द्वितीयश्री(लक्ष्मी),त्रितीय-धी(बुद्धि),चतुर्थ–ज्ञान और पंचम -सम्मान चला जाता है।पहले पहल जब हम किसी से कुछ मांगते हैं तो हमें बहुत शर्म लगती है पर बाद में हमारे अन्दर से शर्म ख़त्म हो जाती है।इसी प्रकार हमारा ज्ञान ,मान सम्मान और बुद्धि का भी क्षय होता है।  इसलिए भूल कर भी किसी से कुछ मत मांगो।

ये छः बातें साधक का पतन कर देने वाली हैं:

जब हम गुरू को साधारण मनुष्य समझते हैं , भगवान के विग्रह में पाषानबुद्धि कर लेते हैं , मन्त्र को केवल शब्द समझते हैं , चरणामृत को सामान्य जल जानते हैं,भगवान् के  महाप्रसाद को केवल अन्न मानते हैं और  साधू की जाति पर दृष्टि रखते हैं और उसका प्रेम नहीं देखते तो हमें अपना पतन निश्चित जानना चाहिए।गुरू हमें भवसागर से पार उतार सकता है ,मन्त्रों में इतनी शक्ति होती है कि पत्थर को भी चूर-चूर कर दें,भगवान् के चरणामृत और महाप्रसाद जिसने पाया उसका कल्याण हो गया और साधु का दिया हुआ वरदान कभी व्यर्थ नहीं जाता और जो उपरोक्त करता है उसे इन बातों से बचना चाहिए।

वाणी और शरीर के दोष हैं:

हम अपनी वाणी से परनिंदा, मिथ्याभाषण और कटुभाषण जैसे दोष को अंजाम देते हैं और ये नहीं सोचते कि इस तरह हम अपने आप को ही नुकसान पहुंचा रहे होते हैं।मिथ्याभाषी का कोई विश्वास नहीं करता।कटुभाषी से सब नफरत करते हैं।इसी प्रकार हम अपने इस शरीर से चोरी,व्यभिचार और हिंसा जैसे दोषपूर्ण काम करते हैं जो हमारे शरीर को ही नुक्सान नहीं पहुंचाते अपितु हमारे मन ,मस्तिष्क को भी नुक्सान पहुंचाते हैं।इन कार्यों से हमारा मन मलीन हो जाता है ,हमें कोई पसंद नहीं करता ,हम हर समय भयभीत रहते हैं और हमारे जीवन से सुख,चैन चला जाता है।

अत: भरसक प्रयत्न कर के उपरोक्त शरीर और वाणी के दोषों से बच्चों और स्वयं को दूर रखना चाहिए ताकि हम सभी के प्रिय बनें रहें और समाज में सम्मान के पात्र बनें।

इन दो प्रकार की इच्छाओं का त्याग करो:

हमें दो प्रकार की इच्छाओं प्रथम काम्यमान इच्छा अर्थात् ऐसी इच्छा जिसमें वस्तु सामने न होने पर भी केवल सुन -सुन कर ही उसे भोगने की इच्छा होती है और भुज्यमान इच्छा जिसमें वस्तु सामने आने पर उसे भोगने की इच्छा होती है,का त्याग कर देना चाहिए क्योंकि यदि मन में कोई इच्छा रख कर भजन किया जायेगा तो इससे इच्छा की ही पुष्टि होगी। इच्छा की निवृति तो इष्टाकार वृत्ति होने से ही होती है।अर्थात् भौतिक वस्तुओं की इच्छा न कर केवल उस परम पिता परमेश्वर की ही इच्छा करनी चाहिए जो हमें भवसागर से पार कराने वाली है।