जीवन के ऋण :-

मानव जीवन में जब पुन्य का क्षय होता है और पाप अपना प्रभाव डालते हैं ,जब साधना से ,सद्विचारों से ,सत्कार्यों से मानव मुँह फेर लेता है तथा अहंकार एवम् किसी भी बल के मद में अपने को महान समझने लगता है तो उसके जीवन में तीन दोषों में से एक दोष अवश्य ही आ जाता है।पहला दोष है रोग अथवा बीमारी ,दूसरा वाद-विवाद अर्थात् मुकदमा और तीसरा दोष ऋण है जो दरिद्रता के कारण होता है।दोषों से कष्ट व दुःख होता है।इन  तीन दोषों में सबसे भयानक एवम् दुखदायी है ऋण दोष।ऋण अथवा कर्ज जीवन में किये सारे कर्मों पर पानी फेर देता है।मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार के ऋण का भोग होता है –पहला माता पिता का ऋण ,दूसरा गुरू ऋण और तीसरा धन ऋण।इन तीन शत्रुरूपी ऋणों को व्यक्ति को अपने जीवन में ही चुकता कर देना चाहिए अन्यथा इन ऋणों के दोष का बोझ उसे अगले जन्म में भोगना पड़ता है।ये ऋण दोष सामान्य मानव के शत्रु हैं।इनकी शत्रुता से मुक्ति पा कर ही भौतिक सुख व आनंद की प्राप्ति हो सकती है।

मातृ-पितृ ऋण :

यह ऋण मनुष्य पर इसलिए रहता है कि वह उनके कारण ही इस मनुष्य जीवन को पा सका और इस संसार में प्राप्त सभी प्रकार के सुखों एवम् आनंद का मार्ग उनके द्वारा बना।अत: जो व्यक्ति अपने जीवन में माता-पिता की सेवा नहीं करता उसे यह ऋण दोष लगता है ,जिसे आने वाले जन्मों में चुकाना पड़ता है।इसलिए भरसक प्रयत्न करें और जिस प्रकार बचपन में माता-पिता ने हमें ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया ,हमारी छोटी –छोटी बातों का ख्याल रखा ,उसी प्रकार हम वृद्धावस्था में उनकी सेवा करें ,उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरतों का ख्याल रखें ,उन्हें कोई कष्ट न होने दें ,तो हम किसी हद तक मातृ-पितृ ऋण से मुक्त हो सकते हैं। .

गुरू ऋण :

गुरू का अर्थ है जो आपको ज्ञान दे ,जीवन के वास्तविक रूप के दर्शन कराये ,जीवन को उच्च स्तर तक ले जाने के साधन बताये तथा इस संसार के बन्धनों से छुटकारा दिला कर ईश्वर के निकट आने का सुअवसर बनाये। ऐसे गुरू के प्रति यदि जाने अनजाने कोई दोष हो जाए ,अवज्ञा हो जाए ,अनादर हो जाए ,गुरू के वचनों का पालन नहीं किया जाए ,गुरू सेवा में कुछ न्यूनता रह जाए तो गुरू ऋण चुकता नहीं होता।मन ,कर्म,वचन से किसी भी रूप में गुरू की श्रद्धा में कमी आने पर गुरू ऋण बढ़ जाता है और उसे सांसारिक जीवन में बाधाओं के चंगुल में फंसा देता है जिससे मुक्ति पाने का उपाय केवल गुरू ही बता सकता है।हमेशा मन,कर्म,वचन से गुरू की सेवा करो क्योंकि गुरू ही वो व्यक्ति है जो हमें परमात्मा से मिला कर ,मोक्ष का मार्ग दिखा सकता है।

लक्ष्मी ऋण अथवा आर्थिक ऋण :

यह ऋण व्यक्ति अपनी क्षमता से बाहर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु ,सांसारिक भोग विलास में रमण हेतु ,अपनी झूठी शान-शौकत में वृद्धि एवम् प्रदर्शन हेतु धन के रूप में लेता है। यदि मनुष्य पर तीसरा ऋण नहीं है अर्थात् लक्ष्मी की कमी का दोष नहीं है तो आप रोज बाधा पर पार पा सकते हैं ,मुकद्दमे ,वाद-विवाद ,लड़ाई-झगड़ों के चक्र से निकल सकते हैं।लेकिन यदि धन ऋण है तो ये तीनों दोष गुणक रूप में वृद्धि करते हैं।कभी भी अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर खर्च नहीं करना चाहिए।यदि आप उतने में ही अपना भरण-पोषण करेंगे ,जितना आप कमाते हैं तो कभी किसी से आर्थिक ऋण लेने की नौबत नहीं आएगी।संसार में भोग विलास की तो लाखों वस्तुएँ हैं लेकिन सभी की हमें आवश्यकता नहीं होती।यदि हम केवल आवश्यक वस्तुओं पर ही खर्च करें तो हम उतने में ही गुजारा कर सकते हैं ,जितना हम कमाते हैं।