जीवन मे सफलता के सूत्र :-

१. निष्काम सेवा व साधना करें:

जब बिना किसी स्वार्थ के ,बिना किसी इच्छा के ,निष्काम मन से सेवा  व साधना की जाती है तो भगवान हम पर  प्रसन्न हो कर हमें ये गुण प्रदान करते हैं।  सर्वप्रथम वे हमें ऐसी बुद्धि देते हैं जो पूरी तरह से विवेकशील ,सात्विक विचारों से भरी ,श्रेष्ठ व उन्नत होती है। दूसरा वे हमें स्वस्थ ,बलवान व पूर्ण रूप से निरोगी काया  देते हैं। तथा क्यूंकि हमारी बुद्धि निर्मल हो जाती है तो वे हमें सज्जन लोगो का ,अच्छे श्रेष्ठ माता -पिता का और पूजनीय गुरुजनों का साथ देते हैं।

अक्सर हम अच्छे अच्छे खाने,अच्छे अच्छे पहनने  और  समाज मे अपने रुतबे को ही सब कुछ मान लेते हैं। जबकि ये सब गोंण हैं। इनसे हमारा कोई भला नहीं होता अपितु ये हमें विलासिता की एवं अवगुणों की ओर ले जाते हैं। धीरे -धीरे हमने जो पुन्य कमाए होते हैं उनका भी नाश हो जाता है।

अतः हमें पूर्ण सात्विकता और संयम से विवेकशील जीवन बिताना चाहिए और धीरे-धीरे अपना सम्पूर्ण जीवन प्राणी मात्र की ,समस्त समाज की सेवा मे लगाना चाहिए। प्राणी मात्र की ,समस्त समाज की सेवा ही निष्काम सेवा है। पुराणों मे,वेदों मे ,उपनिषदों मे इसे दिव्य कर्म ,ब्रह्म-कर्म ,अकाम आदि नाम दिए गए हैं।

अपनी विवेकहीन इच्छाओं से मुक्त हो कर हमें माता -पिता ,वेदाज्ञा ,गुरुजनों की आज्ञा ,आत्माज्ञा के अनुरूप ही जीवन जीना चाहिए। यदि हम अपनी आत्मा से उठने वाली आवाज़ जो की परमात्मा की आवाज़ है ,को नहीं सुनते ,उसका निरादर करते हैं तो हमें गड्ढे मे गिरने से ,असफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

२. लक्ष्य साधें ,संकल्प करें :

हमेशा अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करें। जीवन मे सफल होने के लिए लक्ष्य का होना बहुत जरूरी है।हमेशा शुभ लक्ष्य ही चुनें क्यूंकि गलत लक्ष्य या कुछ ऐसा जिससे अन्य का नुक्सान होता हो वह लक्ष्य हमें ऊंचाइयों तक नहीं ले जा सकता। हमें केवल बाहरी रूप से ही सफल नहीं होना बल्कि आंतरिक रूप से भी।

हमें अपने संकल्प मे कभी विकल्प नहीं तलाशने चाहियें मतलब उनसे बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि अपने लक्ष्य को ,शुभ संकल्प को पूरा करने के लिए पूर्ण रूप से पुरषार्थ अथार्थ मेहनत करनी चाहिए।पुरुषार्थ मे ही जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि और आंतरिक पुरुषार्थ हमें निर्मल बना कर भगवान के समीप ले जाता है।

३. सात्विक जीवन जीएं :

सात्विक जीवन से अर्थ है कि बुरे विचारों से अपने को अलग करना। हमें ,नशा ,क्रोध ,प्रतिशोध ,प्रतिक्रिया ,हिंसा ,झूठ ,आदि से दूर रहना चाहिए और इनको कभी अपने अंदर प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। यदि हम अपने समस्त तामसिक दोषों को ख़त्म करने के लिए संकल्पित रहें तो कोई कारण नहीं है कि हमें सफलता न मिले।

४. उदारता व दृढ़ता रखें :

उदारता व दृढ़ता के दो सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। संसार के समस्त दुखो का ,अन्याय का ,अधर्म व अशांति का कारण  ही इन दोनों बातों को न समझना है। जब हम सामाजिक ,आर्थिक ,व्यवहारिक ,पारिवारिक  अन्य परस्पर के सम्बन्धों मे उदारता ,परस्परता या सहअस्तित्व रखेंगे अथार्थ दूसरे के रहन -सहन का ,उनके धर्म का ,उनके रीति रिवाज़ों का मजाक न बनाएं और उनका सम्मान करें और साथ ही साथ अपने आचरण ,अपने धर्म और अपने सिद्धांतों को भी न छोड़ें और उनका दृढ़ता से पालन करें  तो हम सभी सफल हो सकते हैं।

हमें स्वयं के प्रति दृढ़ता  रखते हुए और प्राणिमात्र मे भगवान है ऐसा अनुभव करते हुए सबके लिए उदारता की भावना रखते हुए ,पूर्ण दिव्यता के साथ पूर्ण सत्य की और बढ़ना चाहिए। जब हम ऐसा कर पाएंगे तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। सफलता यहीं होती है जहां दुःख,कलेश न हो और शान्ति का वास हो।