ज्ञान की भूमिका :-
ज्ञान का माहात्म्य
 
 सत्पुरूषों के साथ शास्त्र चिंतन करने से जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है ,उसे तत्त्व का ज्ञान हो जाने से सर्व-व्यापक आत्मा का स्वरुप विदित हो जाता है। वह शुद्ध +बुद्धि द्वारा +परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है।जिसे मोह का विनाश हो जाता है,उसके लिए जगत में विचरण करना रमणीय हो जाता है। जिन्हे आत्म स्वरुप का ज्ञान हो गया है ,उन्हें न शोक होता है,न कामना होती है ,न वे शुभाशुभ की ही याचना करते हैं। वे इस संसार में सब कुछ करते हुए भी अकर्ता के समान रहते हैं। वे हेय और उपादेश के पक्षपात से रहित होकर अपनी आत्मा में स्थिर रहते हैं,पवित्रता से रहते हैं ,और स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्ग पर चलते हैं। इस प्रकार की स्थितियाँ आत्मतत्त्व के साक्षात्कार के अतिरिक्त अन्य उपाय से नहीं उपलब्ध होती। इसलिए मानव को चाहिए कि वह जीवन पर्यन्त आत्मा की ही खोज करे ,उसी की उपासना करे और उसी का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे ,इसके अतिरिक्त उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।
उस केवल रूप परमात्मा की प्राप्ति में धन-संपत्ति ,मित्र,भाई-बंधु ,हाथ पैर का संचालन ,देशान्तर गमन,शारीरिक कष्ट सहन और तीर्थ -सेवन उपकारी नहीं हो सकते। वह  तो केवल मनो जप से प्राप्त किया जा सकता है। उस समय न तो किसी की अभिलाषा करता है न किसी का त्याग ही करता है।
मोक्ष का साधन:
 
मोक्ष के चार ही द्वारपाल बताये गए हैं। जिनमें से एक से भी प्रीति हो जाने पर मोक्ष में प्रविष्ट होने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इन में मुख्य “शम ” है। शम ही परम पद है ,मंगलमय है,शनिदायक ,भ्रम का निवारण करने वाला तथा परम कल्याणकारी है। शम युक्त पुरूष से पिशाच ,राक्षस ,दैत्य ,शत्रु,व्याघ्र अथवा सर्प कोई भी दोष (हानि)नहीं करते।
जो पुरूष प्रिय या अप्रिय को सुनकर ,स्पर्श कर ,देख कर ,खा कर और सूंघ कर न तो हर्षित होता है और न खिन्न होता है ,वह “शांत” कहा जाता है। जो इंद्रियों को वश में करके समस्त प्राणियों के साथ समतापूर्वक व्यवहार करता है तथा न तो भविष्य की आकांक्षा करता है और न प्राप्त का परित्याग करता है ,वह“शांत” कहलाता है।
जिसका मन मरण उत्सव ,और युद्ध के अवसर पर भी व्याकुल न हो कर चन्द्रमण्डल के समान निर्मल आभा से युक्त रहता है ,वह “शांत” कहा जाता है। हर्ष ,और कोप का अवसर उपस्थित होने पर भी जो न तो हर्ष को प्राप्त होता है ,न क्रोध ही करता है ,वह “शांत” कहा जाता है। जिसकी अमृत प्रवाह के समान सुखदायिनी तथा प्रेम-पूर्ण दृष्टि सभी प्राणियों पर समान रूप से पड़ती है  उसकी “शांत” संज्ञा होती है। जिसकी बुद्धि राग-द्वेष रुपी कलंक से दूषित नहीं होती ,उसे “शांत” कहा जाता है।
विचार :
आत्म -विषयक विचार करने से बुद्धि तीव्र होकर परमपद का साक्षात्कार कर लेती है। संसाररूपी महारोग के लिए विचार ही महा औषधि है। लौकिक दुःख से पार होने के लिए विद्वानों के पास विचार के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। जितने क्रूर कर्म ,निषिद्ध आचरण और कुत्सित मानसिक कष्ट हैं ,वे सारे विचारहीनता से ही आविर्भूत होते हैं।
जगत के सारे पदार्थ तभी तक सत्य की तरह रमणीय प्रतीत होते हैं ,जब तक विचार नहीं किया जाता। विचार करने पर वे नष्ट हो जाते हैं। विचारशील पुरूष गई हुई वस्तु का शास्त्रानुसार उपयोग करता है। वह मन की प्रतिकूलता में न तो क्षुब्ध होता है ,न अनुकूलता में प्रसन्न ही। उस समय जल से परिपूर्ण सागर की तरह उसकी शोभा होती है।
इस प्रकार जिन उदाराज्ञय महात्मा योगियों का मन  पूर्णाकाम हो गया है,वे जीवन मुक्त होकर इस जगत में विचरण करते हैं। जैसे रात्रि में भूतल पर पदार्थों का ज्ञान दीपक से होता है ,उसी प्रकार परमात्मा स्वरूप में स्थिति प्राप्त करने के लिए वेद -वेदान्त के सिद्धांतों को स्थितियों को निर्णय विचार द्वारा होता है। उत्तम विचारों से युक्त पुरूष सामान्य जनों की तो बात ही क्या-,महापुरूषों के लिए भी आदरणीय हो जाता है।
विचारहीनता सारे अनर्थों का निजी निवास स्थान है। सभी सत्पुरूष उसका तिरस्कार करते हैं और वह दुर्गतियों की चरम सीमा है ,अतः उसका परित्याग कर देना चाहिए। विचार से ही तत्त्व का ज्ञान होता है ,तत्व ज्ञान से ही मन की निश्छलता प्राप्त होती है और मन के शांत हो जाने से सम्पूर्ण दुःखों का सर्वत्र नाश हो जाता है।
संतोष:
संतोष ही परम श्रेय है और संतोष ही परम सुख भी कहा जाता है। सन्तोषयुक्त पुरूष परम विश्राम को प्राप्त होता है। जो शांत पुरूष सन्तोषामृत के पान से पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं ,उनके लिए अपरिमित भोग संपत्ति विष  सी जान पड़ती है। जो अप्राप्य वस्तु की आकांक्षा का परित्याग करके प्राप्त हुई वास्तु में समभाव रखने वाला है ,तथा जिसमें हर्ष-शोक के विकार नहीं हैं ,वह मनुष्य इस लोक में संतुष्ट कहा जाता है।
जैसे मलिन दर्पण में मुख की छाया नहीं दीखती ,उसी प्रकार आज्ञा की परवज्ञता से व्याकुल एवं संतोष रहित चित्त में ज्ञान का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशों से मुक्त एवं संतुष्ट है ,वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्य का सुख का उपभोग करता है।
साधु संगम:
 
इस संसार में श्रेष्ठ सन्तसमागम मनुष्यों को संसार सागर से उबारने में सर्वत्र विशेषरूप से उपकार करता है। संत समागम विशेष रूप से बुद्धिवर्धक अज्ञानरूपी वृक्ष का उच्छेदक और मानसिक व्यथाओं को दूर भगाने वाला है। जिसने सत्संगति रूपी गंगा में जो शीतल एवं निर्मल है ,स्नान कर लिया ,उसे दान ,तीर्थ ,तप और यज्ञों से क्या लेना है। जो राग शून्य और संशय रहित है ऐसे संतपुरुष यदि लोक में विद्यमान हैं तो तप एवं तीर्थों के संग्रह से क्या लाभ?
संतोष ,सत्संगति ,विचार और शम ये चारों ही मनुष्यों के लिए भवसागर से तरने के साधन हैं। इनमें संतोष परम लाभ है,सत्संगति परमगति है ,विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है। ये चारों संसार के अवगुणों का समूल विनाश करने के लिए विशुद्ध उपाय है। जिन्होनें इसका सेवन किया वे मोह जल से परिपूर्ण भवसागर से पार हो गए। इन चारों में से एक ही साधन का अभ्यास हो जाने पर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं ,क्योंकि इनमें से एक-एक भी क्रमशः इन चारों की जन्मभूमि है। अतः सबकी सिद्धि के लिए यत्नपूर्वक एक का तो पूर्ण रूप से आश्रय लेना ही चाहिए। जिसके चित्त में उत्तम -फलदायक-एक ही गुण सुदृढ़ हो गया है,उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।