त्यागने योग्य:- 
राग :
 
संसार मे मुख्य रोग है राग। राग से क्रोध की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार धुएँ से आग ,दर्पण के मैल से प्रतिबिम्ब और झिल्ली से गर्भ ढका रहता है ,वैसे ही राग से क्रोध आच्छादित है। यहाँ ये तीन दृष्टांत ,तीन प्रकार के प्रकृति के पुरूषों की दृष्टि से दिए गए हैं। तमोगुणी पुरूष का क्रोध धुएँ से छुपी आग के समान है। जैसे आग फूँक मारने से ही प्रज्वलित हो जाती है वैसे ही तमोगुणी पुरूष का क्रोध मल से आच्छादित दर्पण के प्रतिबिम्ब के समान है ,इसके प्रकट होने के लिए थोड़ा प्रयत्न करना पड़ता है। सत्वगुणी पुरूष का क्रोध झिल्ली में छुपे गर्भ की तरह है ,जो एकाएक प्रकट नहीं होता ,प्रायः अंतःकरण के भीतर ही रहता है। सांसारिक वस्तुओं में राग होना ही मोह है। राग तो केवल भगवान या आत्मा में ही होना चाहिए और कहीं नहीं। वस्तुतः भगवत्प्रेम ही राग की निवृति का साधन है। धर्म या कर्मकांड में जो राग होता है उसे श्रद्धा कहते हैं। और भगवान् में राग होना ही प्रेम है।जब तक भगवान् से अतिरिक्त कोई और वास्तु दिखाई देती है तब तक पूर्ण प्रेम नहीं कहा जा सकता। जब केवल भगवान् ही रह जाएँ तभी पूर्ण प्रेम समझना चाहिए। अतः राग सर्वथा त्याज्य है।
दम्भ :
 
जो बाह्य त्याग अभिमानपूर्वक किया जाता है वही दम्भ कहा जा सकता है। निराभिमानी रहकर किया हुआ बाह्य त्याग तो साधक रूप है। दम्भ बहुत दूर तक चलता है। इसकी गति अच्छे -अच्छे महात्माओं को भी नहीं जान पड़ती। अतः इससे बहुत सावधान रहना चाहिए। अतः दम्भ सर्वथा त्याज्य है।
प्रमाद : 
 
अपने कर्मों को छोड़कर दूसरे के कर्म में लग जाना भी प्रमाद है। यह रजोगुण से होता है। अतः रजोगुणी से तो तमोगुणी ही अच्छा है। यह तो मूर्ख होता है ,अतः सात्विक पुरूष पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। रजोगुणी के संग से वृत्ति खराब हो जाती है। अतः उसका संग सर्वथा त्याज्य है।
निंदा :
 
निंदा करने वाले की अपेक्षा निंदा सुनने वाला अधिक पापी होता है। थोड़े दिन भी निंदा सुनते रहो तो अंतःकरण मलीन हो जाता है। इसलिए पर निंदा न करो। इसका सर्वथा त्याग करो।
मोह और अभिमान :
 
आजकल के ग्यानी और भक्त अभ्यास या भजन की आवश्यकता नहीं समझते ,किन्तु घर के धंधे को छोड़ नहीं पाते। ग्यानी उसे अंतःकरण का धर्म बताकर और भक्त भगवान् का काम कह कर करते रहते हैं। इसी प्रकार कर्मकांडी अपनी कर्मठता के अभिमान में डूबे रहते हैं। इसी से इन तीनों का पतन होता है। अतः मोह और अभिमान सर्वथा त्याज्य हैं।
विष और विषय :
 
विष के खाने से मृत्यु होती है किन्तु विषय के स्मरण से ही पतन हो जाता है। अतः विष और विषय दोनों ही त्याज्य हैं।
क्रोध :
 
अंतःकरण की शीलता काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह से दब जाती है और एक आग सी उत्पन्न होती है ,जो पहले शरीर को गर्म करती है फिर वाणी को। यह आग ही क्रोध है। शास्त्र में काम और क्रोध इन दोनों को अग्नि ही कहा है। क्रोध सोचने समझने की शक्ति को नष्ट कर देता है। निंदक,हिंसक और शठ इन तीनों के प्रति क्रोध न करें। क्रोध मष्तिष्क के साथ साथ शरीर को भी नष्ट कर देता है। इसलिए क्रोध सर्वथा त्याज्य है।
पापात्मा :
 
पापी पुरूष चाहे जप करे अथवा ध्यान ,भले ही ज्ञानी हो जाए ,तो भी पतित हो जाएगा। पापी का उद्धार किसी प्रकार नहीं हो सकता। अतः पापात्मा का साथ सर्वथा त्याज्य है।
विषयासक्ति :
 
जब तक विषयों में भोग-बुद्धि है तब तक सुख नहीं। संसार में सद् बुद्धि होने से ही संसार में सुख जान पड़ता है। जब उपास्य देव में सद् बुद्धि हो जाती है तो संसार में दुख नहीं रहता। संशय बुद्धि वाले को तो न संसार में सुख है और न उपास्य देव में। जब तक विषयों से पूर्ण विरक्ति नहीं होती तब तक उपास्य् देव में पूर्ण आसक्ति भी नहीं होती। रामायण का आशय है कि पूर्णतयाः रामाकर वृत्ति हो जाए और भागवत का आशय है कि सर्वांगी कृष्णाकार वृत्ति हो जाए। तथापि जो थोड़ा भी साधन में लग गया है उसे संशयात्मा नहीं कह सकते। संशयात्मा तो उस उद्दण्ड का ही नाम है जिसका कही भी विश्वास नहीं है। अतः विषयासक्ति सर्वथा त्याज्य है।