त्यागपूर्वक भोग करो :-

इस परिवर्तनशील संसार में जड़ और चेतन जितना भी जगत है ,सब ईश्वर से व्याप्त है।सब जीवों में उसकी उपस्थिति है।अत: सबको त्याग के साथ अर्थात् पहले सब प्राणियों को ध्यान में रखकर,उनको जरूरत के वक्त मदद और दान आदि दे कर ,फिर भोग करना चाहिए।सारी संपत्ति चूँकि परमात्मा की दी हुई है और हम सब उसके बच्चे हैं इसलिए उस संपत्ति के समान रूप से हकदार हैं।इसलिए हमें ज्यादा लोभ लालच नहीं करना चाहिए।कभी भी सभी कुछ स्वयं के लिए न रख कर सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान आदि करना चाहिए।

सभी उपनिषद कहते हैं कि त्याग पूर्वक भोग करो अर्थात् पहले दूसरों को दो फिर स्वयं भोग करो।वेदों में कहा गया है कि दान जो सर्वश्रेष्ठ है ,समस्त यज्ञों (कर्मों )आधार है।दान भी देख कर देना चाहिए कि जिसको दान दे रहे हैं वह सुपात्र है या कुपात्र।जिस प्रकार सुक्षेत्र अर्थात् उपजाऊ भूमि में बोया गया बीज ही पनपता है ,उसका बोया जाना उपजाऊ जमीन में ही सार्थक और सफल होता है ,उसी प्रकार केवल सुपात्र को दिया हुआ दान ही सार्थक और सफल माना गया है।कभी भी ऐसे व्यक्ति को दान नहीं देना चाहिए जिसको इसकी जरूरत न हो या वह उस दान का सदुपयोग करना न जानता हो।

दान कभी भी मजबूरी वश नहीं करना चाहिए या प्रशंसा प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए।दान करें पर उतना जितनी शक्ति हो ,सामर्थ्य हो।हाँ ,दान करना जरूर चाहिए।क्योंकि हमारे मरने के बाद ,हमारे साथ केवल हमारे सत्कर्म और किये गए दान ही जाते हैं।

दान हमेशा देश,काल और पात्र को देख कर करना चाहिए और ऐसा दान ही सात्विक दान कहलाता है।ऐसे देश में दान देना चाहिए जहाँ अन्न,विश्राम स्थल या उत्तम विद्या आदि की कमी हो।इसे देश और स्थिति देख कर दान करना कहा गया है।भूख के समय अन्न का दान देना ,गर्मी में जल का दान देना श्रांत को आश्रय का दान देना ,सर्दी में गरम कपड़ों का दान देना, आदि दान काल देख कर दान देना कहे गए  है।यदि हम भूखे को पानी ,प्यासे को रोटी और सर्दी में ठन्डे कपड़ों का दान करेंगे तो दान लेने वाले के लिए उसका औचित्य ही क्या रह जाएगा।तब वो दान ,दान नहीं कहलायेगा।

हमेशा पात्र को देख कर दान करना चाहिए।कभी ऐसे व्यक्ति को दान न करें जो आलसी हो,प्रमादी हो,दुराचारी हो।हमेशा ऐसे व्यक्ति को दान दें जिसे इसकी जरूरत हो और जो आलसी,प्रमादी,दुराचारी न हो और द्रव्य का दुरूपयोग न करे।आजकल हम देखते हैं कि हमने तो दान कर दिया और दान लेने वाला उस पैसे से दुर्व्यसन कर रहा है।ऐसे दान का कोई फायदा नहीं है।दान हमेशा सुशील,सत्कर्मी को ही देना चाहिए।दान हमेशा उस को दें जो दान लेने का वाकई अधिकारी हो जैसे दीन,अपाहिज और अनाथ जन।

दान,एक तरह का त्याग ही है।दान की कोई सीमा नहीं होती।आप स्वयं तो एक हद तक ही खा सकते हैं पर दूसरों को खिलाने की तो कोई सीमा ही नहीं होती।कितनों को ही खिलाया जा सकता है।इसकी कोई गिनती ही नहीं है।इसी तरह,हम अनगिनत लोगों को वस्त्र दान कर सकते हैं।अपनी सामर्थ्य के अनुसार चाहे जितने औषधालय,विद्यालय ,धर्मशालाएँ ,कुएं आदि बनवाये जा सकते हैं ,जिनसे अनगिनत लोग लाभ उठा सकते हैं।

ध्यान रखने योग्य यह है कि कभी भी दिए हुए दान का अभिमान न करें।सोचें कि जो दान किया है वो तो भगवान् ने ही आप को दिया था और भगवान् तो सबको समान चाहते हैं अत: वह तो उसी व्यक्ति का था ,जिस को दान दिया गया है।

असली सुख तो,असली आनंद तो इन लोक उपकारक कार्यों द्वारा,जो दान के माध्यम से होते हैं,लोगों को सुखी और आनंदित देख कर ही प्राप्त होता है।जिस प्रकार त्याग भावना से किये जा रहे भोग के विस्तार असीमित हैं अर्थात् इन लोक उपकारक कार्यों की और इनके द्वारा लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों की कोई गिनती नहीं है,उसी प्रकार इन कार्यों को करके जो अभौतिक ,अलोकिक सुख प्राप्त होता है वो भी असीमित है।हमारे द्वारा किये जाने वाले समस्त कर्म,समस्त कामनाएं, वस्तुतः अधिकाधिक आनंद लाभ के निमित्त ही होते हैं और दूसरों को दान दे कर,उनको खिला पिला कर,वस्त्रादि दे कर ,उनकी जरूरत में उनकी सहायता कर के जो आनंद आता है वो स्वयं खाने,पहनने और अपने लिए जीने की तुलना में कहीं अधिक आनंददायी है।