दयालु होने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है :-

यदि एक पिता बूढ़ा हो रहा हो और अपने बच्चों को,संसार में कामयाब बनने योग्य बनाने के लिए कोई सुझाव या सलाह देना चाहे तो वह क्या होगी ?हर एक माता-पिता अपने बच्चों को अलग -अलग शिक्षा देंगे पर उन में बहुत कुछ समान होगा जैसे:
पहला है कि कोशिश करना और अपनी धरती के नियमों और अपने धर्म की आवश्यक शिक्षाओं के खिलाफ न जाना। यदि हमारा लालन-पालन धार्मिक नहीं है तो भी हम बौद्ध धर्म की आचार संहिता को अपना सकते हैं जैसे कि किसी को न मारना ,चोरी न करना,झूठ न बोलना ,मादक पदार्थों का सेवन न करना ,विषय-भोगों से दूर रहना आदि। ज्यादा जरूरी है आध्यात्मिक रहना न कि अंध विश्वासी होना।
हर व्यस्क को  समाज के लिए उपयोगी कार्यों को करने की जरूरत को समझना चाहिए।  आदर्शरूप में ये ऐसा होना चाहिए जिसे करते हुए उसे ख़ुशी मिले और जिसमे उसका रुझान हो।
एक बालक को यह जानना चाहिए कि वह किस प्रकार लोगों से मिल-जल कर रह सकता है। इसके लिए जरूरी है की गैर आवश्यक तर्क और लड़ाई से बचें। दोस्त बनाने से पहले एक अच्छा श्रोता होना अति आवश्यक है।
संसार बहुत तेजी से बदल रहा है  और आने वाले वक्त में शायद ये पूरा ही बदल जाए। हम इस बदलाव की तीव्र गति का सामना कैसे करेंगे? इस जटिल संसार में बने रहने के लिए जिन  मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता है वे हैं -ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और सोचने की क्षमता और साथ ही साथ रुकावटों के बावज़ूद कोशिश करते रहना। जब हम ये जान जाएंगे कि संसार बदलता है किन्तु धर्म और दर्शन के मूलभूत सिद्धांत जो की विभिन्न धर्म ग्रंथों में बताये गए हैं,नहीं बदलते  या कम-ज्यादा एक से ही रहते हैं तो हम बदलाव से डरना छोड़ देंगे।
हम अपनी सोचने की शक्ति को कुछ न कुछ हर रोज पढ़ कर या लिख कर भी बढ़ा सकते हैं। हमें अपने खान-पान और व्यायाम पर भी ध्यान देना चाहिए। प्यार करने की क्षमता होना बहुत आवश्यक है। सबसे उच्चतम भावना है सद्‍भाव जो की इच्छा है दूसरों की भलाई को सुनिश्चित करने की।
जैसे कि दलाई लामा ने कहा है ,”ये मायने नहीं रखता कि हम धार्मिक हैं या नहीं ,बल्कि ये मायने रखता है कि  हम दयालु हैं कि नहीं। “