दिव्य सन्देश:११

ऐसे व्यक्ति जो कभी गलतियाँ नहीं करते ,वही हैं जो कभी कुछ नहीं करते।विविध

अर्थात् हम जब कोई काम करते हैं या कोई बात करते हैं तो गलती की संभावना बनी रहती है क्योंकि कोई भी १०० प्रतिशत नहीं दे सकता।पर यदि हम कुछ करेंगे ही नहीं तो गलतियाँ भी नहीं होंगी। यहाँ भावार्थ ये है कि बिना अपनी गलतियों से घबराये अपना कर्म करते रहना चाहिए केवल अपनी गलतियों से सबक ले कर आगे उस गलती को न दोहराएँ।

अहित कामना क्रोध की पराकाष्ठा है।प्रेमचंद्र 

अर्थात् जब हम किसी व्यक्ति से किसी बात पर नाराज होते हैं तो उस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में क्रोध उत्पन्न होने लगता है और जब यही क्रोध हद लांघ देता है तो हम उसका अहित करने के नए नए तरीके खोजने लग जाते हैं।ये सब क्रोध की पराकाष्ठा है और इससे हमारा ही अहित होता है न की अन्य का।

फल मनुष्य के कर्म के अधीन है।चाणक्य 

अर्थात् जिस प्रकार के कर्म हम करेंगे उसी प्रकार के फल भी हमें प्राप्त होंगे।चोरी करने वाले व्यक्ति को जेल ही प्राप्त हो सकती है और परिश्रम करने वाले व्यक्ति को सफलता।इसलिए हमें ऐसे कर्म करने चाहियें जिससे हमें पुण्य फल की प्राप्ति हो और हम पवित्र आत्मा हो कर मोक्ष को प्राप्त कर सकें।

शत्रुओं को क्षमा करना बदले का सबसे अच्छा साधन है। –अज्ञात

अर्थात् यदि हम किसी की शत्रुता का बदला शत्रुता से देते हैं तो हमारी कटुता और बढ़ेगी ही क्योंकि जैसे आग में घी डालने से आग और भड़क उठती है उसी प्रकार शत्रुता का जवाब शत्रुता से देने से ,शत्रुता और घनी हो जाती है।यदि हम अपनी शत्रुओं को क्षमा कर देते हैं तो हो सकता है उसे अपने ऊपर ग्लानि महसूस हो और वो सुधर जाए।जब हम किसी के विचार और तौर-तरीके बदल पाते हैं तो बदला लेने का इससे अच्छा उपाय और क्या हो सकता है।    

बालकों पर प्रेम की भांति द्वेष का असर भी अधिक होता है।प्रेमचंद्र 

अर्थात् बालक मन तो चिकनी मिटटी के समान होता है।उसे हम जिस सांचे में ढालेंगे वो वैसा ही बन जाएगा।यदि हम उसे सबसे प्रेम करना सिखायेंगे तो वो सबसे प्रेम करना सीखेगा और यदि हम उसे लोगों से ईर्ष्या करना ,द्वेष करना सिखायेंगे तो वो सबसे घृणा करना ,द्वेष करना सीख जाएगा।इसलिए बच्चों को सोच समझ कर शिक्षा देनी चाहिए।

जिसका हृदय वैर या द्वेष की आग में जलता है,उसे रात को नींद नहीं आती।विदुर 

अर्थात् किसी से वैर करना या द्वेष करना किसी बिमारी से कम नहीं होता।जिस प्रकार बीमार व्यक्ति को रात को नींद नहीं आती ,उसी प्रकार वैर से ग्रस्त व्यक्ति रात-दिन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि जिससे वह द्वेष करता है ,वैर करता है उसे कैसे नुक्सान पहुंचाए।इसी चक्कर में वह सो भी नहीं पाता।कहने का अर्थ ये है कि वैर ,द्वेष जैसी बिमारी जिससे रातों को नींद भी न आये और अपना ही नुक्सान हो क्यों पाली जाए/क्यों न इसके बदले प्रेम और विश्वास की भावना को मन में रखें जिससे सब सुख शांति से रह सकें और सुख की नींद ले सकें।

जो जैसा सोचता है और करता है,वह वैसा ही बन जाता है।-महर्षि वशिष्ठ

अर्थात् यदि हम नकारात्मक सोचेंगे,गलत सोचेंगे ,किसी का बुरा सोचेंगे तो बात-बात  में खोट निकालने लगेंगे ,किसी को नुक्सान पहुँचाने लगेंगे।और यदि हम प्रत्येक क्षण दूसरों की भलाई के बारे में ,अच्छे विचारों के बारे में सोचेंगे तो हमारा अंत:करण शुद्ध होगा और हम पवित्र बनेंगे।इसलिए हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम कभी भूल कर भी गलत विचार ,किसी को नुक्सान पहुंचाने के विचार मन में न लायें क्योंकि इससे हमारा ही नुक्सान है ।   

एक बीज तभी वृक्ष बन पाता है,जब वह स्वयं को पूरी तरह गला देता है।जाहिर है आधे-अधूरे प्रयासों से कोई भी जीवन के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।विभु प्रभा जी 

अर्थात् हमें कोई भी कार्य पूरी मेहनत,ईमानदारी और लगन से करना चाहिए ,तब ही हम सफल हो सकते हैं और जीवन में ऊंचाइयों को छू सकते हैं।यदि हम अपने लिए कोई लक्ष्य तय करते हैं और उसके लिए प्रयत्न नहीं करते तो वो लक्ष्य हमें किस प्रकार प्राप्त हो सकता है।इसलिए पूर्ण रूप से प्रयास करना चाहिए ताकि सफलता हमारे कदम चूम सके।