दिव्य सन्देश:१२

दूसरों के लिए किये गए कार्य से आत्मशुद्धि होती है। इससे अहंकार कम होता है।  –विवेकानन्द 

अर्थात् जब हम दूसरों के लिए कार्य करते हैं तो हमारे मन में दया भाव ,प्रेम भाव आदि शुभ लक्षण पैदा होते हैं।हम दूसरों की ख़ुशी में खुश और उनके दुःख से दुखी होने लगते हैं।इससे मैं की भावना अर्थात् अहंकार की भावना कम होती है और व्यक्ति की आत्मशुद्धि होती है।

बदला लेने से मनुष्य अपने शत्रु के समान  हो जाता है।  बेकन

अर्थात् जब कोई व्यक्ति हमारे साथ बुरा करता है और हम भी उसका बदला बुराई से देते हैं,कोई हमारे साथ शत्रुता करता है और हम भी उसके साथ शत्रुता करने लग जाते हैं तो हममें और उस में फर्क ही क्या रह जाता है।किन्तु यदि हम उसकी बुराई का बदला अच्छाई से देते हैं ,उस की शत्रुता का बदला मित्रता से देते हैं तो उस व्यक्ति को भी बदलने की क्षमता रखते हैं।   

दुखों का क्षय पुरुषार्थ से होता है।   –योग वशिष्ठ 

अर्थात् बैठे –बैठे यदि यह सोचें कि हमें जीवन की सारी खुशियाँ मिल जाएँ तो यह संभव नहीं हैं।भगवान् ने हमें इतना सक्षम बनाया है कि हम मेहनत करें और पुरूषार्थ करें।वस्तुएँ भी उसने सभी बनायी हैं।पर ये हमें तभी मिलेंगी जब हम मेहनत करेंगे।इसलिए तो कहा है कि मेहनत से कमाई एक सूखी रोटी में भी पकवानों सा स्वाद होता है।जब हम पुरूषार्थ करेंगे तो हमें सभी मनवांछित वस्तुएँ प्राप्त होंगी और हमारे दुखों का क्षय होगा।

जिसमें दया नहीं ,उसमें कोई सदगुण नहीं।  हज़रत मुहम्मद 

अर्थात् दया के भाव से ही मन में करुणा का संचार होता है ,और जब मन में करुणा का संचार होता है तो आप से आप ही हमारे मन में अच्छे विचार आने लगते हैं।और अच्छे विचारों से ही जीवन में सदगुणों का आगमन होता है।

समय और सागर की लहर किसी की प्रतीक्षा नहीं करती।  रिचर्ड ब्रेथव्हेर 

अर्थात् समय बहुत ही बलवान होता है ,इसलिए उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।अपितु जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग अच्छे कार्यों को करने के लिए करना चाहिए।बहुत मुश्किल से ये मनुष्य जन्म मिलता है।यदि हम इसको अच्छे कार्यों में ,अन्यों की भलाई में नहीं लगायेंगे तो ये समय गुजर जाएगा और ये जन्म व्यर्थ हो जाएगा।अत: समय का सदुपयोग करना चाहिए।

मनुष्य का चरित्र उसकी वाणी से प्रकट होता है।  एक उक्ति

अर्थात् बोल हमेशा दिल से निकलते हैं।यदि हमारा अंत:करण शुद्ध होगा तो हमारे बोल भी शुद्ध और मधुकर होंगे ,हमारे बोल भी प्रिय लगेंगे और प्रेम से भरे होंगे।किन्तु यदि हम कटु विचारों से भरे होंगे तो वाही वाणी के रूप में हमारी जबान पर आ जाएगा।इसलिए किसी की वाणी ही उस के मन का हाल,उसका चरित्र बताने के लिए पर्याप्त है।     

संतोष और सज्जनता ही शक्ति है।  जेहर

अर्थात् जीवन में सभी कुछ सभी लोगों को नहीं मिलता।प्रत्येक को भगवान् द्वारा उतना ही दिया जाता है जितना कि वास्तव में उसको जरूरत है।यदि इस बात को समझ कर प्रत्येक मनुष्य जो मिला है उस में संतोष करे तो दुःख का कोई कारण नहीं है क्योंकि यदि कल को हमें वास्तव में ज्यादा की भी जरूरत होती है तो परमात्मा उस के लिए भी राह निकाल देता है।सज्जनता बनाए रखने से दुश्मन भी दोस्त हो जाते हैं।इस प्रकार संतोष और सज्जनता हमारी शक्ति बन जाते हैं।