दिव्य सन्देश:४

चिंताग्रस्त व्यक्ति मृत्यु से पहले कई बार मरता है।

अर्थात् जब हम चिंता करते हैं तो असंख्य रोगों को निमंत्रण दे देते हैं।चिंता के कारण हमें रात भर नींद भी नहीं आती।हमारी सोचने-समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है और हमारा सारा ध्यान चिंता की तरफ लगा रहता है ,जिससे हमारी कार्यक्षमता पर भी असर पड़ता है।चिंता ग्रस्त व्यक्ति एकान्त पसंद करता है और मृतप्राय हो चिंता में डूबा हुआ पड़ा रहता है।इस प्रकार चिंताग्रस्त व्यक्ति मृत्यु पूर्व कई बार मरता है।इसलिए चिंता को त्याग कर केवल कर्म करना चाहिए।यदि ऐसा करेंगे तो कुछ समय पश्चात पायेंगे कि वो चिंता ही मिट गयी हैजिसको ले कर हम इतने परेशान थे।

सफलता मन की शीतलता से उत्पन्न होती है। ठंडा लोहा ही गर्म लोहे को काट व मोड़ सकता है। 

अर्थात् जब हम मन से शीतल होते हैं तो हमारे सोचने-समझने की शक्ति तीव्र होती है।इस प्रकार हम ज्यादा बेहतर और अच्छा सोच पाते हैं।साथ ही साथ एक शांत व्यक्ति का साथ हर कोई देना चाहता है क्योंकि वो कटु शब्दों का इस्तेमाल कभी नहीं करता।इस प्रकार अन्य व्यक्तियों के सहयोग से और बेहतर सोच से हम सफलता की ऊँचाइयों को छू सकते हैं।इसलिए सदा शांतचित रहना चाहिए।

धन गया तो कुछ नहीं गया ,स्वास्थ्य गया तो थोड़ा सा गया ,अगर चरित्र गया तो सब कुछ चला गया।

 अर्थात् धन और स्वास्थ्य ऐसी वस्तु हैं जो एक बार खोने के बाद फिर से प्राप्त की जा सकती हैं।धन चला जाता है तो पुरुषार्थ से फिर से अर्जित किया जा सकता है।स्वास्थ्य जाने पर भी हम अपने रहन-सहन में परिवर्तन कर के उसे ठीक कर सकते हैं।किन्तु यदि एक बार चरित्र चला जाता है तो जीवन भर का लांछन लग जाता है जो लाख प्रयत्न करने पर भी ठीक नहीं हो सकता।जिसकाचरित्र चला गया वो समस्त संसार में निंदनीय हो जाता है ,उसकी कोई सहायता भी नहीं करता और ऐसे व्यक्ति से सभी दूर रहना चाहते हैं।इसलिए अपने चरित्र को हमेशा बनाए रखना चाहिए और विषय-वासना से बचना चाहिए।

जब हम क्रोध की अग्नि में जलते हैं तो इसका धुआँ हमारी ही आँखों में जाता है। 

अर्थात् क्रोध की अग्नि हमारी सोचने समझने की शक्ति को नष्ट कर देती है।हम क्रोधावस्था में देख नहीं पाते कि हम क्या कह रहे हैं या क्या कर रहे हैं,जिसका क्रोध शांत होने के बाद हमें पछतावा भी होता है।क्रोधित व्यक्ति न केवल औरों को बल्कि अपने को भी नुक्सान पहुंचा सकता है।इसलिए कहा गया है कि कभी क्रोध नहीं करना चाहिए क्योंकि ये हमारे विवेक को हर लेता है।

अगर आपको देखना ही है तो हर  एक की विशेषताएं देखिये। अगर आपको कुछ छोड़ना ही है तो अपनी कमज़ोरियाँ छोडिए।

अर्थात् यदि हम दूसरों की विशेषताओं को देख कर भी नजरअंदाज कर देंगे तो उनको अपनायेंगे कैसे ?हमेशा जहां से भी मिले अच्छी बातें ,अच्छी आदतें ,अच्छे विचार ले लेने चाहियें और यदि हमें ये बिना कोई मोल दिए अन्य से प्राप्त हो रहे हैं तो उन्हें लेने में हिचकिचाहट क्यूँ।अक्सर हम ईर्ष्यावश ऐसा करते हैं पर अपना ही नुक्सान करते हैं।हमें तो अपनी कमजोरियों को छोड़ना चाहिए जिन्हें हम छोड़ना नही चाहते और दूसरों की विशेषताओं को अपनाना चाहिए।