दिव्य सन्देश:५

गलतियां ध्यान ना देने की वजह से होती हैं  और फिर तनाव उत्पन्न होता है।

अर्थात् सभी काम पूरी ईमानदारी ,लगन और एकाग्रता से करने चाहिए क्योंकि यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो कहीं न कहीं गलती होने का खतरा बना रहेगा और हमारा काम बिगड़ सकता है।काम बिगड़ने की स्थिति में हम तनाव में आ जाते हैं और खुद को मानसिक या शारीरिक नुक्सान पहुंचा सकते हैं।इसलिए एक साथ दो कामों पर,दो बातों पर ध्यान न दे कर पहले उस कार्य को पूरी एकाग्रता से ख़त्म करें जो ज्यादा महत्वपूर्ण है और तब दूसरे कार्य पर नजर डालें।

एक चूहे को यदि नमक का एक दाना भी मिल जाता है तो वो खुद को बनिया समझने लगता है।

अर्थात् कभी भी कुछ मिल जाने पर अत्यधिक प्रसन्नता नहीं दिखानी चाहिए।इससे ऐसे लगता है कि जीवन में वो चीज हमने कभी पायी नहीं है।हो सकता है दूसरों के पास ,जो हमने पाया है उस से भी अधिक हो।ऐसे में वो हमें मुर्ख ही समझेगा।दूसरे शब्दों में ,कभी भी थोड़े प्राप्त कर के रुक नहीं जाना चाहिए।जरा सी सफलता प्राप्त कर के यदि हम रुक गए और मेहनत करना बंद कर दिया तो एक बड़ी सफलता कैसे हासिल करेंगे।इसलिए ये सोच कर कि हमने सब कुछ पा लिया है कर्म करना न छोड़ें क्योंकि कर्म करते रहने से ही वास्तविक सफलता हासिल होगी जिसका ये छोटा सा नमूना है जिसे हम सब कुछ मान बैठे हैं।

किसी भी काम को करने से पहले एक क्षण रुक कर इसके प्रभाव के बारे मे सोच लें तब उस काम को शुरू करें। 

अर्थात् बिना विचारे जो करे ,सो पाछे पछताए।काम बिगाड़े आपना ,जग में होत हंसाये।।जब हम कोई भी काम बिना उसको करने की योजना बनाए ,बिना उसके अच्छे-बुरे के बारे में विचार करे करते हैं तो बाद में हमें उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।हमेशा सोच विचार कर ही कोई काम करना चाहिए।उससे होने वाली लाभ-हानि को जान कर ही या इसको करने से स्वयं या अन्य को कोई कष्ट या नुक्सान तो नहीं पहुँच रहा ऐसा विचार कर ही कोई कार्य करना चाहिए।

अपनी जरूरतों के लिए धन कमाना अच्छी बात है पर सम्पति की भूख हो जाना बिलकुल गलत है।अर्थात् जरूरत  से ज्यादा संचय करना गलत है।

अर्थात् हमें केवल उतना ही कमाना चाहिए जितने कि हमें आवश्यकता हो।या हम अधिक भी कमायें तो हमें वो धन गरीबों में या जरूरतमंदों में बाँट देना चाहिए न कि संचित करना चाहिए।संचित करने से तो उस में कुछ प्रतिशत की ही वृद्धि होगी जबकि जरूरतमंदों को देने से जो उनका आशीर्वाद मिलेगा और उससे जो सुख और शान्ति का अनुभव होगा वो सौ प्रतिशत होगा।इसलिए कभी भी संचय न करें और जरूरतमंदों की मदद करते रहें।

अगर मै हमेशा दूसरे लोगों के साथ खुद की तुलना करता रहूंगा तो मै या तो अहंकार या ईर्ष्या से ग्रस्त हो जाऊँगा।

अर्थात् या तो हमारे पास दूसरे से अधिक हो सकता है या दूसरे से कम हो सकता है।यदि हमारे पास दूसरे से अधिक है तो हमें अपने पास अधिक होने का अहंकार हो जाता है और हम दूसरों को अपने से कम आंकने लगते हैं और उनको हीन दृष्टि से देखने लगते हैं।इसी प्रकार यदि हमारे पास दूसरों से कम होता है तो हम दूसरों से जलने लगते हैं और उनको नुक्सान पहुँचाने की सोचने लगते हैं।दोनों ही स्थितियाँ बहुत ही भयावह हैं।अहंकार से भी और ईर्ष्या से भी हम अपने मानसिक संतुलन को बिगाड़ लेते हैं।ये स्थिति तुलना करने से आती है।इसलिए आप जैसे भी हैं संतुष्ट रहें और दूसरों से खुद की तुलना न करें क्योंकि भगवान् ने आपको आपकी आवश्यकता अनुसार दिया है और दूसरे को उसकी आवश्यकता अनुसार।