दिव्य सन्देश:६

क्यूंकि विचार सभी कर्मों के बीज अर्थात् जन्मदाता हैं ,इसलिए मैं केवल अच्छे और शुद्ध बीज (विचार)बोाऊं (रखूं ) ,ताकि जो फल मिले वह भी सर्वश्रेष्ठ हो।

अर्थात् सदा अपने मन को ,अपने कर्मों को ,अपने वचनों को पवित्र रखें ,क्योंकि जिस प्रकार खेत में अच्छे बीज बोने पर ही अच्छी और श्रेष्ठ फसल मिलती है उसी प्रकार अच्छे और पवित्र विचारों वाला व्यक्ति ही अच्छे और पवित्र कर्म कर सकता है जो सबको ख़ुशी और सुख प्रदान कर सकते हैं।जब प्रत्येक व्यक्ति सुखी और समृद्ध होगा तो हमें भी प्रसन्नता और सकून मिलेगा।दूसरों को प्रसन्न देख कर जो प्रसन्नता मिलती है वो चिरस्थाई होती है और ये हमारे अच्छे कर्मों का फल होता है जो सर्वश्रेष्ठ होता है।

झूठ पर टिके रिश्ते उन घरों की तरह होते हैं जिनकी बुनियाद रेत में होती है। इस तरह के रिश्ते लम्बे समय तक नहीं चल सकते।

अर्थात् कभी-कभी लोग हमसे इसलिए रिश्ते बना लेते हैं कि उनको हमसे कोई काम करवाना होता है ,कोई आर्थिक सहायता चाहिए होती है या हमारा सम्बन्धी बन कर हमसे कोई बैर निकालना होता है।पर ऐसे रिश्ते देर तक नहीं चलते।ऐसे रिश्ते प्रेम और विश्वास की मजबूत नींव पर नहीं टिके होते अपितु लोभ,लालच ,क्रोध,ईर्ष्या की रेतीली जमीं पर बने होते हैं और पल में बिखर जाते हैं।या तो ऐसा व्यक्ति अपना काम निकलवाने के बाद,या हमसे पैसा लेने के बाद या हमें कोई नुक्सान पहुँचाने के बाद हमसे अपना रिश्ता तोड़ लेता है या हमें ही पहले उसके मंसूबों का पता चल जाता है और हम उससे किनारा कर लेते हैं।इसलिए कभी भी रिश्ते बनाएं तो ऐसे बनाएं जो प्रेम और विश्वास पर निर्भर हों।

अगर मै अपने सभी लेन –देन में ईमानदार हूँ ,तो मुझे डर का एहसास कभी नहीं होगा।

अर्थात् ऐसा व्यक्ति ही डरता है जिसके मन में चोर हो या जिसने कोई गलत काम किया हो।ऐसे व्यक्ति को क्या डर जिसने किसी का कोई पैसा नहीं मारा हो।किसी से कोई वस्तु ले कर लोटाई न हो।जो प्रत्येक लेन-देन में ईमानदारी बरतता है उसे कोई डर नहीं होता।इसलिए ईमानदार बने रहें।

बुराई के बारे मे सोचने या उससे डरने से बुराई हमारे मस्तिष्क पर सवार हो जाती है।

अर्थात् हम जैसा सोचते हैं वैसा ही हमारे जीवन में होने लगता है और हम वैसे ही बन जाते हैं।जब हम हर वक्त बुराई के बारे में ही सोचते रहेंगे तो पवित्र विचारों के बारे में कहाँ सोच पायेंगे और वो हमारी जिन्दगी से दूर हो जायेंगे और इनका स्थान बुराई ले लेगी और हम बुरा सोचने ,बुरा बोलने और बुरा कहने लग जायेंगे।इसलिए ठीक कहा गया है कि बुरा मत सोचो ,बुरा मत देखो और बुरा मत कहो।

जहाँ प्यार नहीं होता वहाँ शान्ति नहीं हो सकती। जहां पवित्रता नहीं होती वहाँ प्यार नहीं हो सकता।

अर्थात् हमें अपने विचारों में पवित्रता बनाए रखनी चाहिए क्योंकि जब हम ऐसा करेंगे तभी प्रत्येक मनुष्य को अपने जैसा समझेंगे ,हमारे जीवन में सद्गुणों का संचार होगा ,हम क्रोध,द्वेष,अहंकार,झूठ आदि बुरी आदतों से दूर होंगे।जब हमें मानसिक रूप से अँधा कर देने वाले ये अवगुण हमसे दूर हो जायेंगे तो हमारे जीवन में प्यार का संचार होगा और हम मानवमात्र से प्यार कर पायेंगे।जब प्रत्येक मनुष्य अन्य मनुष्यों से प्यार का सम्बन्ध रखेगा तो कलेश,लड़ाई ,कटुता के लिए जगह ही कहाँ बचेगी और सम्पूर्ण विश्व में शान्ति का संचार होगा।