दिव्य सन्देश : 


जब तुम किसी की सेवा करो तब उसकी त्रुटियों को देख कर उससे घृणा नहीं करनी चाहिए।

अर्थात् कमियाँ तो हम सब में होती हैं।इसलिए किसी और में कमी है तो कोई कारण नहीं है कि हम उससे घृणा करें।यदि हम किसी की सेवा करते हैं और उस से उस की त्रुटियों के कारण घृणा करते हैं तो उस सेवा का अर्थ ही क्या रह जाएगा क्योंकि ऐसे में हम उसकी सेवा क्या करेंगे जब हम उस से घृणा ही करते रहेंगे।

मनुष्य के रूप में परमात्मा सदा हमारे सामने है ,उनकी सेवा करो।

अर्थात् हम सब भगवान् की ही संतानें हैं और इसलिए भगवान् के ही अंश हैं।यदि हम जरूरतमंदों की सेवा करते हैं ,उनकी मदद करते हैं तो भगवान् को बहुत ही प्रसन्नता होती है।भगवान् को तो प्रत्यक्ष हर कोई देख नहीं सकता।इसलिए मनुष्य रुपी उस के अंश को ही भगवान् मान कर उस की सेवा करनी चाहिए।

सम्पन्नता मित्रता बढ़ाती है ,विपदा उनकी परख करती है।

अर्थात् हर कोई संपन्न व्यक्ति व्यक्ति से मित्रता करना चाहती है पर विपदा के समय ही ऐसी मित्रता की परख होती है।यदि विपत्ति में संपन्न मित्र हमारी मदद करता है तो यो मित्र कहलाने के योग्य है और यदि वो अपने पैसों को देखता है तो वो मित्र कहलाने के योग्य नहीं है।इसी प्रकार यदि किसी कारणवश संपन्न मित्र की संपत्ति चली जाए और दूसरा उससे मित्रता तोड़ दे तो वो मित्र कहलाने के योग्य नहीं है और यदि उस परिस्थिति में भी दूसरा मित्र पहले मित्र का साथ नहीं छोड़ता तो वो सच्चा मित्र है।इसलिए कहा है कि मित्रता की परख विपदा में ही होती है।

एक बार निकले बोल वापस नहीं आ सकते ,इसलिए सोच कर बोलो। 

अर्थात् जिस प्रकार कमान से निकला हुआ तीर वापस नहीं लौटाया जा सकता उसी प्रकार कहे गए शब्द भी वापस नहीं आ सकते।वो सीधे जा कर उस व्यक्ति पर वार करते हैं जिसको कहे गए हैं।इसलिए बोलने से पहले सोच लेना चाहिए कि जो मैं बोल रहा हूँ इस से किसी को कोई ठेस तो नहीं पहुंचेगी।कभी भी चुभते हुए वचन न बोलो।हमेशा मीठे और सबको शान्ति प्रदान करने वाले बोल बोलने चाहिए।

अंधा वह नहीं जिसके आँखें नहीं ,अँधा वह है जो अपने दोषों को ढकता है।

अर्थात् जब हम जान बूझ कर अपने अवगुण और दोष छुपाते हैं तो वास्तव में अपना ही नुक्सान कर रहे होते हैं।अपने अवगुणों और दोष को उजागर कर के और उनको दूर करने का उपाय खोजने की बजाय हम इस और अपना ध्यान लगाए रखते हैं कि हमारे दोष किसी को पता न चल जाएँ।इस प्रकार हम अपने दोषों को संरक्षण ही दे रहे होते हैं जबकि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।इस प्रकार अपने दोषों को ढकना अर्थात् उन से आँख चुराना अंधे होने का ही पर्याय है।

चिंता से रूप ,बल और ज्ञान का नाश होता है।

अर्थात् जब हम चिंता करने लगते हैं तो हमारी भूख,प्यास मर जाती है।चिंता की लकीरें हमारे चेहरे पर नजर आने लगती हैं।हमारी मुस्कराहट चली जाती है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं।इससे हम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और हमारे रूप और बल का नाश हो जाता है।तनावग्रस्त होने से हमारे सोचने समझने की शक्ति चली जाती है और इससे हमारे ज्ञान का भी नाश हो जाता है।इसलिए व्यर्थ चिंता नहीं करनी चाहिए।

दूसरे को गिराने की कोशिश में तुम स्वयं गिर जाओगे।

अर्थात् जब हमारा सारा ध्यान इस बात की ओर ही लगा रहेगा कि सामने वाले को कैसे नुक्सान पहुँचाया जाए तो हम अपना स्वयं का काम सुचारू रूप से कैसे करेंगे और जब हम स्वयं का काम सुचारू रूप से नहीं करेंगे तो दूसरे को तो क्या नुक्सान पहुंचाएंगे या गिराएंगे अपितु स्वयं ही गिर जायेंगे अर्थात् खुद को नुक्सान पहुंचाएंगे।