पतन का कारण:-

एक जिज्ञासु शिष्य ने गुरू से पुछा,सभी मनुष्यों की बनावट एक जैसी है,फिर उनमें से कुछ पतन के गर्त में गिर कर क्यों डूब जाते हैं?

गुरू जी ने उसे दुसरे दिन एक तालाब के किनारे बुलाया।कहा,तुम्हारे सवाल का जवाब वहीँ मिलेगा।ठीक समय पर दोनों तालाब के किनारे पहुंचे।गुरू के पास दो कमंडल थे।उनमें से एक साबुत था।दूसरे के तल में छेद था।गुरू ने दोनों कमंडल शिष्य को दिखाए।उसके बाद साबुत तले वाला कमंडल शिष्य के हाथों से लेकर तालाब में फैंक दिया।कमंडल तैरता रहा।कुछ ही देर बाद उन्होंने छेद वाला कमंडल भी पानी में फैंक दिया।तालाब में गिरते ही इस कमंडल में पानी भरने लगा और देखते ही देखते वह डूब गया।

गुरू ने उसी सहजता से समझाया,”मनुष्यों की बनावट में भी ऐसे ही फर्क होते हैं।जिन मनुष्यों में असंयम का दोष होता है,बाहर की दुश्प्रवृतियाँ उनमें आसानी से प्रवेश कर जाती हैं और आखिरकार उनके डूबने का कारण बनती हैं।इसके विपरीत जिन मनुष्यों में चारित्रिक मजबूती होती है,उनके अन्दर बाहरी दुष्प्रवृतियाँ नहीं घुस पातीं।”

शिष्य समझ गया कि अपने व्यक्तिगत दुर्गुणों से ही मनुष्य संसार की दुष्प्रवृतियाँ की चपेट में आ जाता है और डूब जाता है।जिनमें दोष या छिद्र नहीं हैं,वे तैरते रहते हैं और पार उतरते हैं।

वस्तुत: हमारे असंयम का मुख्य कारण हमारा,इन्द्रियों के वश में होना है।जब हम इन्द्रियों के वश में होते हैं तो हमारा मन उस चंचल घोड़े के समान हो जाता है जो कभी इधर-तो कभी उधर चलायमान रहता है।उसे भोग विलास की वस्तुएँ ही अच्छी लगती हैं।मनुष्य विषयभोग में पड़ कर अनेक दुर्गुणों का घर बन जाता है।वो हर वक्त विषय वासना का चिंतन करता हुआ अंततः पतन को प्राप्त होता है।

वहीँ जब हमारी आत्मा का नियंत्रण हमारी इन्द्रियों पर रहेगा,तो हमारा मन नियंत्रित रहेगा और भोग विलास में नहीं पड़ेगा।इस प्रकार हम अपने मन को सद्विचारों से भर सकेंगे और प्रभु के और समीप जा सकेंगे।पार उतरने से अर्थ है मोक्ष को प्राप्त करना।जिसने भगवान् की भक्ति में चित्त को लगा लिया वो दुर्गुणों से दूर हो गया और मोक्ष को प्राप्त हो गया,इसमें कोई संशय नहीं है।

इसलिए अपने जीवन को दोष रहित रखने के लिए हमें अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए जो ध्यान द्वारा प्राप्त होता है।इस प्रकार दोष रहित जीवन ही उत्तम है और इस प्रकार का व्यक्ति भवसागर को पार कर ही लेता है और बीच में ही नहीं डूबता।