पहले स्वयं को बदलें ,फिर अन्य को:-

एक दिन एक धनाढ्य व्यक्ति का लड़का कड़कती धुप में चलकर आ रहा था कि धुप से तपती जमीन ने उसके पैरों को जला डाला। घर आकर उसके मन में एक विचार उठा और वह तुरंत ही  अपने पिता के पास उपस्थित हुआ। पिता के पास जाकर उसने कहा ,”पिताजी ,हमें पूरे विश्व की भूमि पर चमड़ा बिछवा देना चाहिए ,जिससे किसी को भी धूप की तपन सहन न करनी पड़े”। लड़के ने अपना विचार व्यक्त किया। धनवान पिता ऐसा करने में भी समर्थ था। उसने पुत्र की बात पूर्ण धैर्य के साथ सुनी। फिर उसने स्नेह और नम्रतायुक्त शब्दों में कहा ,”बेटा ,यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने पैरों में जूते पहन ले तो भी उन्हें धूप की तपन से राहत मिल सकती है। हमें पूरी पृथ्वी पर चमड़ा बिछवाने का कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है। ”पुत्र को पिता की बात समुचित लगी और वह संतुष्ट होकर ,पिता का आभार व्यक्त करते हुए अपने कार्य पर चला गया।

वस्तुतः हम भी उस लड़के की तरह आचरण कर रहे हैं .सारा दिन दूसरों का चिंतन करते हैं ,दूसरों को देखते हैं ,दूसरों के बारे में सोचते हैं ,दूसरों के कार्यों के बारे में सोचते हैं ,उनमें कमियाँ निकालते हैं ,सोचते हैं इनका क्या होगा ?संसार का क्या होगा ?

परन्तु पहले तो हमें आत्म-निरीक्षण करना चाहिए ,हम स्वयं क्या कर रहे हैं ?हमारा भविष्य क्या होगा ?एक कहावत है –“आप मरे जग प्रलय “अर्थात जिस जिन व्यक्ति की मृत्यु होती है,उसके लिए वही प्रलय का दिन है।इसलिए अपने आप को आत्म-कल्याण के कार्य में लगा देना चाहिए ।जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के पुरुषार्थ में लग जायेगा ,तो एक दिन सम्पूर्ण विश्व ही श्रेष्ठ बन जाएगा। फिर दूसरों को सुधारने की चिंता क्यूँ रहेगी।जब आप स्वयं को देखोगे और अपने आप को बदलोगे और हर व्यक्ति ऐसा करेगा तो किसी अन्य को बदलने की क्या जरूरत रह जायेगी क्योंकि सभी तो पहले ही बदल चुके होंगे।

परन्तु यह कैसी विडंबना है कि मनुष्य मुंह में तम्बाकू रख कर व्यसन मुक्ति पर भाषण देते हैं। मौन व शांत का महत्व चिल्ला-चिल्ला कर बताने का निरर्थक प्रयास करते हैं। बच्चों की लाइन लगा कर ,जनसँख्या नियंत्रण हेतु लोगों को नसबंदी की सलाह दी जाती है। स्वयं तो टीवी के सामने से हटते नहीं हैं और बच्चों से कहते हैं तुम्हारे लिए टीवी देखना अच्छा नहीं है। इस पर बच्चों को भी जवाब देना पड़ जाता है कि आप क्यों देख रहे हैं ?

इस प्रकार आचरण के बिना प्रसारण हो रहा है। जो प्रत्येक स्थान पर विपरीत स्थिति पैदा कर रहा है। इसलिए जरूरत है स्व परिवर्तन की। पहले हम बदलेंगे तो हमें देख कर अन्य अवश्य बदलेंगे। हम अपने जीवन में फैले हुए अन्धकार को अपनी आत्म-ज्योति जगा कर मिटा लें। फिर एक –एक करके जन-जन की ज्योति निश्चित ही जग जायेगी। और एक दिन ऐसा आएगा ,जब समस्त अन्धकार मिटकर सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमय हो जगमगायेगा।