मनुष्य का जीवन किस प्रकार का होना चाहिए :-

मनुष्य को कभी भी किसी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।अर्थात् किसी को तन अथवा मन से कोई कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए।उसे  मन ,वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति वैर की भावना नहीं रखनी चाहिए।कभी भी साम,दाम दंड आदि से लोगों में आपस में कभी फूट नहीं डालनी चाहिए।

मनुष्य को कभी भी किसी व्यक्ति को मोहित कर के प्रलोभनों में नहीं फँसाना चाहिए।उसे अपने तुच्छ सहायकों के साथ भी प्रेम और समता का व्यवहार करना चाहिए।व्यक्ति को कभी भी आलसी नहीं होना चाहिए बल्कि सदा-सर्वदा कर्म करते रहना चाहिए।

व्यक्ति को कभी भी एक-दूसरे का विरोध नहीं करना चाहिए और न ही एक दूसरे से अलग हो कर चलना चाहिए।उसे हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए कि एकता में ही शक्ति होती है।कभी भी व्यक्ति के मन में  एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या ,द्वेष और घृणा की भावना नहीं होनी चाहिए और न ही उसे दूसरे की उन्नति को देख कर जलना चाहिए।

मनुष्यों को चाहिए कि वे साधारण लोगों की धर्म –सम्बन्धी तथा अन्य कल्पनाओं से दूर रहें।अपने विवेक का इस्तेमाल कर के खुद को अविद्या और अज्ञान से निकाल कर सदा भगवान् में ही समर्पित रहना चाहिए।कभी भी अन्यायपूर्वक कार्य नहीं करना चाहिए अपितु  सदा न्यायानुकूल कार्य ही करने चाहियें।

व्यक्ति को समझना चाहिए कि समय बहुत ही कीमती होता है और जो समय एक बार चला जाता है वो लौट कर नहीं आता इसलिए व्यर्थ की गपशप और बकवास में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहिए।उसे हमेशा खाने-पीने और मौज उड़ाने में नहीं लगे रहना चाहिए।व्यक्ति को कुछ समय भगवान् की स्तुति करने में भी लगाना चाहिए। उसे स्तुति ,प्रार्थना ,उपासना दंभ पूर्वक नहीं करनी चाहिए बल्कि मन से करनी चाहिए।

व्यक्ति को सदा दानशील रहना चाहिए।हमेशा दीन ,दुखी ,पीड़ित और दुर्बलों की सहायता करनी चाहिए।सदा अपने ज्ञान और भक्ति को लोगों में बांटना चाहिए।सदा परोपकारी होना चाहिए और दूसरों के हितसाधन में लगे रहना चाहिए।अपने मन से काम,क्रोध ,लोभ और मोह आदि शत्रुओं को दूर भगा कर अपने हृदय को शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए।हमेशा सांसारिक विषय-भोगों में लिप्त नहीं रहना चाहिए।

व्यक्ति को चित्त की वृत्तियों को निरुद्ध करके,मन को शुद्ध,पवित्र और निर्मल रखना चाहिए।सदा निर्मल दृष्टि रखनी चाहिए,बल्कि सभी इन्द्रियों को निर्मल रखना चाहिए।शरीर को बलवान और शक्तिशाली बनाना चाहिए।खान-पान और दिनचर्या सादा रखनी चाहिए।वासनाओं और तृष्णाओं को दूर हटा कर मन,वचन और कर्म से शुद्ध और पवित्र रहना चाहिए।

व्यक्ति को सोचना चाहिए कि बोले हुए शब्द कभी भी वापस नहीं आ सकते इसलिए उसे हमेशा सत्य ,प्रिय और हितकर बोलना चाहिये चाहे कितनी आपत्तियाँ और संकट आयें।कभी भी कटु और तीखा नहीं बोलना चाहिए।कभी भी मूर्खों का संग नही करना चाहिए।कभी भी स्वार्थी और भोग-विलासी लोगों की संगति नही करनी चाहिए क्योंकि वे सदा अपने शरीर की पुष्टि और तुष्टि में ही उलझे रहते हैं और आत्म-पथ पर नहीं चलने देते।धर्म और ईश्वर की हँसी उड़ने वाले व्यक्तियों से दूर रहना चाहिए।

व्यक्ति को परस्पर हिंसा और मार-काट नहीं करनी चाहिए।एक दूसरे की वृद्धि के लिए,भलाई और कल्याण के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।आध्यात्मिक बल और ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए कठोर साधना करनी चाहिए।हमेशा दूसरों को तारने में ,परोपकार में और उजड़ों को बसाने में अपना योगदान देना चाहिए।सदा सदाचार में प्रवृत्त रहना और दुराचार से दूर रहना चाहिए।

व्यक्ति को अपनी संकल्प शक्ति को बनाए रखना चाहिए।उसे अधिक से अधिक सहनशील बनने का प्रयत्न करना चाहिए।साहसी और वीर बनना चाहिए।शत्रु का वध न कर के शत्रुता का वध करने का सोचना चाहिए।द्वेषी का नहीं द्वेष का उन्मूलन करना और द्वेष की भावना को काटकर फैंक देना चाहिए।निंदक से प्यार करना और निंदा का सफाया कर देना चाहिए।छली और कपटी से भी प्रेम करना चाहिए किन्तु छल और कपट का अंत कर देना चाहिए।

व्यक्ति के अन्दर आत्महीनता की भावना यदि है तो उसका परित्याग करना चाहिए।अविद्या,अन्धकार और अधर्म का नाश कर देना चाहिए।पर्वत के समान उच्च और अचल और मेघ के समान उदार बनना चाहिए।कभी भी श्रम से थकना नहीं चाहिए।अशिथिल बनना चाहिए और ढील-ढाल ,आलस्य और प्रमाद को पास नहीं फटकने देना चाहिए।चारित्रिक ,नैतिक और धार्मिक रूप से जीवित रहना चाहिए।रोगरहित और स्वस्थ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

व्यक्ति को उद्ध्योगी ,पुरूषार्थी और प्रगतिशील बनने का प्रयत्न करना चाहिए।संतोषी बनना चाहिए।मोह रहित ,नि:स्पृह बनना चाहिए।अपने जीवन से पाप,अधर्म ,अन्याय और असद्व्यवहार को निकाल कर पुण्य का समावेश करना चाहिए।बुरे चाल-चलन ,दुष्टाचार और दुष्ट व्यवहार को सर्वथा छोड देना चाहिए।मन ,कर्म,वाणी से सुद्ध ,पवित्र और निर्मल बनना चाहिए।हमेशा कर्मशील रहना चाहिए और पुरूषार्थ करते रहना चाहिए।हमेशा निरभिमानता और शालीनता से रहना चाहिए।

व्यक्ति को सदा सुप्रसन्न रहना और कष्ट,आपत्तियों में भी हँसते हुए आगे बढना चाहिए।हिंसा करना ,चोरी करना ,व्यभिचार ,मादक पदार्थों का सेवन करना ,जुआ खेलना ,असत्य बोलना ,कठोर बोलना इन सब से बचना चाहिए।कर्मशील,कामनाशील ,मननशील बनना और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।इन्द्रियों को हमेशा संयमित और वश में रखना चाहिए।दुःख,शोक,आपत्तियों और विपत्तियों में सदा प्रसन्न रहना चाहिए।