मन की सोच

जीवन के सफ़र में अक्सर हम कई प्रकार के लोगों से मिलते हैं .प्रत्येक लोगों के बारे में हमारी अलग-अलग राय बन जाती है.कई लोग हमें अच्छे लगते हैं तो कई बुरे .अक्सर व्यक्ति जब किसी अन्य व्यक्ति से मिलता है तो किसी तीसरे शख्श की बुराई शुरू कर देता है .वहीं कई बार व्यक्ति स्वयम किसी अन्य के बारे में किसी और से उलटी सीधी बातें सुनता रहता है.

मेरा ये विचार है कि कभी भी कानों और जुबान का कच्चा नहीं होना चाहिए.यदि कोई आ कर हम से कहे कि फलाना व्यक्ति आप के बारे में उलटी-सीधी बातें कर रहा था तो ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए .

ऐसी बातें सुन कर सम्बंधित व्यक्ति से अपने सम्बन्ध तोड़ने की बजाय हमें चाहिए कि उस व्यक्ति से रूबरू हो कर आपसी ग़लतफहमी दूर कर लें .इस में किसी बिचोलिये की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.

अक्सर हम दूसरों से सुनी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और इस प्रकार किसी व्यक्ति के बारे में अपनी धारणा बना लेते हैं और उस से अपने सम्बन्ध खराब कर लेते हैं .जबकि हो सकता है ऐसी कोई बात ही न हो और आपसी बातचीत से ये ग़लतफहमी दूर हो जाए.

वहीं हमें कोई भी बात सोच विचार कर ही कहनी चाहिए .किसी के बारे में कोई भी बात करने से पहले ये विचार कर लेना चाहिए कि वास्तव में सामने वाले व्यक्ति का उद्देश्य क्या है .हो सकता है वह ठीक हो और आप व्यर्थ में ही उसे गलत समझ रहे हों और उस के बारे में गलत बातें प्रचारित कर रहे हों .

इसलिए कोई भी बात करने से पहले उसे विचारों की कसौटी पर कसें और फिर कहें .कोई भी बात सुन कर पहले उसे विवेक के तराजू पर परखें फिर प्रतिक्रिया दें.

जीवन में विभिन्न मित्र ,सम्बन्धी,आदि बड़ी मुश्किल से मिलते हैं .इसलिए सीधे बात कर के ये जान लें कि आप दोनों का कुछ भी करने या कहने का तात्पर्य क्या था .यदि बातचीत से ये पता चल जाए कि कोई गलत उद्देश्य नहीं था तो अपने सम्बन्ध बरकरार रहने दें .अन्यथा आगे बढ़ें.पर बिना सोच विचार के कोई प्रतिक्रिया न दें…………………………………………………………संदीप