मुक्ति के उपाय :-

यदि हम मुक्ति चाहते हैं तो हमें अपने मन से विषयों अर्थात् उपभोग की इच्छाओं को विष समझ कर त्याग देना चाहिए।उत्तम गुणों जैसे क्षमा ,सरलता ,दया ,संतोष और सत्य का जीवन में संचार करना चाहिए।ये सब गुण अमृत के समान हैं।

हमारा शरीर पंचतत्वों से मिल कर बना है और इस शरीर का संचालन आत्मा के द्वारा होता है जो चैतन्यरूप है।हमें आत्मा को जानना  चाहिए न की इन पंचतत्वों को।यदि हम इस शरीर का मोह छोड कर चैतन्यरूप आत्मा में ही स्थिर रहेंगे तो शीघ्र ही सुख,शान्ति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे।

जब हम आत्मा को जानते हैं और उस में ही स्थिर रहते हैं तो हम जानते हैं कि क्यूंकि हम स्वयं आत्मा ही हैं अत: निर्लिप्त ,निराकार हैं और धर्म,अधर्म,सुख,दुःख जो मस्तिष्क की उपज हैं से दूर हैं।इसलिए न तो हम कुछ करते हैं और न ही कुछ भोगते हैं।अतैव सदा मुक्त ही हैं।

अहंकार वश हो कर हम ये सोचने लगते हैं कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है उसके करने वाले हम ही हैं।पर वास्तव में तो करता वो परम पिता ही है।जब हम ऐसा समझ जाते हैं तो हम बंधन मुक्त हो जाते हैं।

ये जगत तो इक सराय मात्र है और हम इस के मोह रुपी रस्सी से जकड़े हुए हैं। जब हम ये बात समझ जायेंगे कि ये विश्व तो अवास्तविक है और केवल भगवान् ही सच्चाई है और उस परमानंद का ध्यान कर खुश रहने लगेंगे तो खुद को मुक्ति के द्वार पर खड़े पायेंगे।

जब हम इस भाव को कि मैं केवल शरीर हूँ ज्ञान रुपी तलवार से काट डालते हैं और अपरिवर्तनीय ,चेतन व अद्वैत आत्मा में जो सर्वव्यापी ,पूर्ण ,एकमुक्त ,अक्रिय ,असंग ,इच्छारहित व शांत है,में ही खुद को देखते हैं तो हम बंधन मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

जब हम खुद को दोषमुक्त,प्रकाशवान ,शुद्ध और ज्ञानस्वरूप मानेंगे,और इच्छा रहित ,विकाररहित ,शीतलता के रूप उस चैतन्य अर्थात शाश्वत और सतत परमात्मा को जान कर जो हमारे भीतर भी है और बाहर भी और समस्त प्राणियों में विद्यमान है और निराकार एवं चिरस्थाई है उस में मन लगा लेंगे और आकार को असत्य जानेगे अर्थात् शरीर को नाशवान जानेंगे तो हमें पुन: जन्म लेने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।