मोक्ष प्राप्ति का उपाय :-

जो न तो अत्यन्य अज्ञानी हैं और न तत्व ज्ञानी ही हैं ,वही शास्त्र को पढने अथवा सुनने का अधिकारी है।जो मोक्ष के उपाय रूप इन वैराग्यादि छह प्रकरणों का विचार (अनुशीलन) करता है वह विद्वान पुरूष फिर संसार में जन्म नहीं लेता।यह जगत भ्रम मात्र है।जैसे रूप रहित आकाश में नील-पीत आदि वर्णों का भ्रम होता है ,उसी प्रकार निर्गुण –निराकार ब्रह्मा में अज्ञानवश जगत की संत का भ्रम होता है।इस भ्रम को इस तरह भुला दिया जाए कि फिर कभी इसका स्मरण ही न हो –यही उत्तम ज्ञान है। सम्पूर्ण रूप से वासनाओं का जो परित्याग है ,वही उत्तम मोक्ष कहलाता है ,जिसे अविद्या रुपी मल से रहित ज्ञानी प्राप्त कर सकते हैं।

यह वासना दो प्रकार की होती है –भुद्ध और मलीन।भुद्ध वासना जन्म का नाश करने वाले मोक्ष की हेतु होती है।मलीन वासना जन्म की हेतु है।उसके कारण जीव जन्म –मृत्यु के चक्कर में पड़ता है।अज्ञान ही इसकी घनीभूत आकृति है।यह अहंकार से बढती है ,किन्तु जो वासना भुने हुए बीज के समान पुनर्जन्म रुपी अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति को त्याग कर केवल शरीर धारण मात्र के लिए स्थित रहती है ,वह भुद्ध कही जाती है ,ऐसे पुरूष जीवन मुक्त कहलाते हैं।

मूढ़ बुद्धि हुए लोग संसार के पदार्थों में सुख न होने पर भी उनमें सुख मानते हैं और उसी के लोभ में आकृष्ट हो कर इधर-उधर भटकते रहते हैं।यद्यपि यहाँ लोग किसी के द्वारा बेचे नही गए हैं ,फिर भी बिके हुए के समान परवश हो रहे हैं।इस बात को जानते हुए भी कि यह सब कुछ माया का खेल है ,हम सब लोग मूढ़ बने बैठे हैं।ये तरह-तरह के भोग्य पदार्थ मनुष्य की सद्गुण राशि का नाश कर देती है और अनेकों दुःख दिया करते हैं।ये धन,भव चिंताओं के चक्कर में डालने वाले हैं।अज्ञान रुपी रात्री में तीव्र मोह रुपी कुहरे से लोगों की ज्ञान रुपी ज्योति के नष्ट हो जाने पर ,दूसरों को दुःख देने में परम चतुर ,विषय रुपी सैंकड़ों चारे हर समय और प्रत्येक दिशा में ,विवेक रुपी श्रेष्ठ रत्न का अपहरण करने के लिए जी-जान से लगे हुए हैं।तत्त्व ज्ञानी ही उनको नष्ट करने में समर्थ हैं ,दुसरे नहीं।

लक्ष्मी न कभी स्थिर रहती है और न उत्कृष्ट ही कहलाने योग्य है ,क्योंकि वह सबको व्यामोह में डालती रहती है ,वह निश्चय ही अनर्थ की प्राप्ति कराने वाली है।धन संपत्ति बड़े –बड़े विद्वान ,शूरवीर ,कृतग्य ,सुन्दर और कोमल स्वभाव वाले मनुष्यों को भी मलीन कर देती है।ऐसे व्यक्ति संसार में दुर्लभ ही होते हैं जो धन-संपत्ति से युक्त हो कर भी ,जनता की निंदा का पात्र न हो ,शूरवीर हो कर भी अपने मुह से बड़ा-चढा कर प्रशंसा न करता हो तथा स्वामी होकर भी सेवक पर समान दृष्टि रखता हो।

उसी प्रकार ये आयु भी अस्थिर है।मूर्ख व्यक्ति आयु का विस्तार चाहता है और कामनाओं की पूर्ति के लिए कष्ट झेलता हुआ पैदा होता और  मरता रहता है।जबकि संसार में केवल उन्ही जीवों का जन्म लेना सफल है जो फिर यहाँ जन्म नहीं लेते ,शेष प्राणी तो बूढ़े गधों के समान हैं जो इस कष्टदायक जीवन भार को ढोए जा रहे हैं।

वस्तुतः ,इस संसार में श्रेष्ठ संत समागम ही मनुष्यों को संसार सागर से उबरने में सर्वत्र विशेष रूप से उपकार करता है।संत समागम विशेष रूप से बुद्धि वर्धक ,अज्ञान रुपी वृक्ष का उच्छेदक और मानसिक व्यथाओं को दूर भगाने वाला है।जिसने सत्संगति रुपी गंगा में जो शीतल एवम् निर्मल है ,स्नान कर लिया ,उसे दान ,तीर्थ ,तप और यज्ञों से क्या लेना है,जो रात्र शून्य और संशय रहित है ऐसे संत पुरूष यदि लोक में विद्यमान हैं तो तप एवम् तीर्थों के संग्रह से क्या लाभ ?

संतोष,सत्संगति ,विचार और शम ये चारों ही मनुष्य के लिए भवसागर तरने के साधन हैं।इनमें संतोष परम लाभ है ,सत्संगति परम गति है ,विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है।ये चारों संसार के मोह-माया का समूल विनाश करने के लिए विभुद्ध उपाय हैं ,जिन्होंने इनका सेवन किया वे मोह -माया से परिपूर्ण भवसागर से पार हो गए हैं।इन चारों में से एक ही साधन का अभ्यास हो जाने पर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं।जब तक मनुष्य परम पुरूषार्थ के के अभय से अपने चित्त रुपी गजराज को जीतकर हृदय में एक गुण भी धारण नहीं कर लेता ,तब तक उत्तम गति की प्राप्ति नहीं हो सकती।जिसके चित्त में उत्तम फलदायक एक ही गुण सुदृढ़ हो गया है ,उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।