मोक्ष प्राप्ति के लिए उपासना :-

जगत में चौरासी लाख योनियों में मनुष्य जन्म सर्वश्रेष्ठ माना गया है। श्री आदि शंकराचार्य महाराज जी ने कहा है ,”जन्म,विद्या ,योग्यता आदि प्राप्त करके भी जो मनुष्य आत्म-मुक्ति के लिए पुरूषार्थ नहीं करता , वह असद्ग्रह से आत्महत्या करता है।“ मोक्ष ही परम पुरूषार्थ है।मनुष्य का परम लक्ष्य मोक्ष ही है।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमारे शास्त्रों में बहुत से साधन बताये गए हैं ,परन्तु सबका लक्ष्य एक ही है ।रुचि और अधिकार के भेद से मार्गों में अंतर हो सकता है।साधारणतया लोग अपने-अपने इष्टदेव की पूजा या भक्ति करके उपासना करते रहते हैं।इसके अतिरिक्त विशेष उपासना पद्धति भी अनेक रूपों में प्रचलित हैं।कुछ दुर्लभ उपासनाएँ उपनिषदों में वर्णित हैं।

वास्तव में उपासना का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है।जैसे भक्ति एक क्रिया का नाम है ,वैसे ही उपासना भी एक क्रिया का नाम है।उपासना शब्द में उप ,आस् और अन –ये तीन अंश हैं।शास्त्रविधि के अनुसार उपास्यदेव के प्रति तैलधारा की भांति, दीर्घकाल पर्यन्त चित्त की एकात्मकता को उपासना कहते हैं,भगवान् में प्रवृत्ति ही भक्ति या उपासना कही गयी है।

जिस क्रिया के द्वारा हम अपने को अपने इष्ट के साथ विराजमान कर सकें ,उसी का नाम उपासना है।उप –समीपे +आसना –स्थितिः = उपासना।भाव प्रवण मन से उपासना करें अथवा उपासना से मन में भाव प्रवणता हो तो उपासना सहज एवम् सरल होती है और वह अबाध रूप से सरिता की प्रबल धारा की तरह निरन्तर अपने इष्ट की ओर बहती रहती है।

यदि साधक भक्त के मन में भाव प्रवणता पूर्णरूप से विकसित न हो पायी हो तो उसका रूप प्रज्ज्वलित अग्नि के समान नहीं होता।किसी के मन में घूम की तरह,किसी के मन में चिंगारी की तरह और किसी के मन में अंगार की तरह उसका रूप होता है।इसका कारण नाना जन्मों के संचित संस्कार होते हैं।सिद्धों के सत्संग से उनके मन में भी धीरे-धीरे भाव प्रवणता प्रज्जवलित अग्नि का रूप धारण कर सकती है ।

चार प्रधान बातों के योग से उपासना बलवती बनती है –

  • सात्विक आहार –न्यायोपार्जित धन के द्वारा पवित्रता से बना हुआ अमक्ष्य पदार्थों से रहित परिमित भोजन ही सात्विक आहार है ।
  • सत्य भाषण – वाणी द्वारा हित ,मित एवम् प्रियता से भरा सत्य ही सदा बोलना चाहिए।
  • संयम –इन्द्रियों एवम् मन पर नियंत्रण रखना ही संयम है।
  • सत्संग –संतों की संगति एवम् उनमें अनुराग रखना तथा उनके उपदेश व कथामृत का पान करना ही सत्संग है ।

उपासना में सफलता के चार कारण होते हैं –

  • विश्वास –अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कमी संदेह न होना ही विश्वास है जो चित्त को असीम बल देता है ।
  • व्याकुलता –जब हम अपने लक्ष्य को पाए बिना पलभर भी चैन से न रह सकें तो हम व्याकुलता की स्थिति में हैं ।मन जब ऐसी स्थिथि में होता है तो अविलम्ब कार्य-सिद्धि होती है।
  • संकल्प् त्याग –जब साधक अभ्यास द्वारा अपने मन में अनुकूल –प्रतिकूल किसी प्रकार का संकल्प न उठने दे तब उसकी ‘संकल्प त्याग ‘अवस्था होती है ।उस अवस्था में चित्त ब्रह्म रूप हो जाता है।
  • समता –जब साधक फल की प्राप्ति या अप्राप्ति में ,शीघ्रता या विलम्ब से प्राप्ति में अपने चित्त को सम रखकर साधना में लगा रहता है तो उसकी ‘समता ‘की स्थिति होती है ।

उपासना में उपासक और उपास्य दो मुख्य अंग होते हैं।अब उपास्य के जाने बिना उपासना तो नहीं हो सकती अतैव गुरू की आवश्यकता होती है ,जो उपास्य का परिचय कराता है ।जो अज्ञान को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है ,जो धर्म का उपदेश देता है ,जो धर्म की बातें करता है ,वह गुरू है।

उपासना में ज्ञान योग ,भक्ति योग ,और कर्म योग का समावेश होता है।निरंतर उपास्य तत्व के ज्ञान अर्जन में लगे रहना ,उपास्य तत्त्व का भजन करना ,गुण-कीर्तन करते रहना और उपास्य की सेवा में अपने कर्ममय जीवन को लगाये रखना ही उपासक का जीवनालोक है।

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोक कर मन से उन इन्द्रियों के विषय का चिंतन करता है ,वह मिथ्याचारी है।अतैव उपासक को बहुत सावधान रहने की जरूरत है।अंत:करण की शुद्धि ही उपासना का मुख्य आधार होना चाहिए।उपासक को त्यागी ,तपस्वी बनना पड़ेगा तभी उसका जीवन सार्थक होगा और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।