लक्ष्मी प्राप्ति के उपाय :१

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लक्ष्मी का तात्पर्य है –समृद्धि एवं सम्पन्नता।लक्ष्मी ‘श्री ‘रूपा हैं जो वात्सल्यमयी हैं ,धन-धान्य,संतान देने वाली हैं ,जो मन और वाणी को दीप्त करती हैं ,जिसके आने से दानशीलता प्राप्त होती है ,जो वनस्पति और वृक्षों में स्थित हैं ,जो कुबेर ,इंद्र ,और अग्नि को तेजस्विता प्रदान करने वाली हैं ,जो जीवन को परिश्रम का ज्ञान कराती हैं ,जिसके कारण आकर्षण शक्ति स्थित होती है ,जिसकी कृपा से मन में शुद्ध संकल्प और वाणी में सत्यता आती है ,जो शरीर में तरलता और पुष्टि प्रदान करने वाली हैं ,उस ‘श्री ‘का जीवन में स्थाई होने के लिए बारम्बार प्रार्थना की गयी है।

जिस मनुष्य पर लक्ष्मी की कृपा दृष्टि होती है ,वह निर्गुण होते हुए भी ज्ञान ,गंभीरता ,तेज,सौभाग्य ,सुख सहित सभी गुणों को प्राप्त हो जाता है और सबके लिए आदर और श्रद्धा का पात्र बन जाता है।भौतिक संसार में लक्ष्मी की कामना –इच्छा और वरण करना अनिवार्य ही है। ,प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अग्रसर होता है।

पर कभी-कभी काल चक्र की कुगति के कारण जब कभी भी व्यक्ति विषय से भी विकराल परिस्थितियों में फंस जाता है तो ऐसी स्थिति में चाहे कोई करोडपति हो या ऊँचे से ऊँचा उद्योगपति ,फूटपाथ पर आने के लिए बाध्य हो जाता है।मनुष्य जीवन में दुःख-दरिद्रता कुछ तो भाग्य का दोष कहा जा सकता है ,और कुछ स्वयं का आचरण ,जो उसे इस प्रकार के दारुणय को भोगने के लिए मजबूर कर देता है।

इसलिए जीवन में नयी चेतना एवं उमंग व उत्साह के लिए लक्ष्मी की कृपा परम सौभाग्य है।लक्ष्मी प्राप्ति के लिए मनुष्य जीवन में लक्ष्मी की नव कलाओं का विकास होना आवश्यक है।जहां इन  नवकलाओं  का विकास होता है ,वहाँ लक्ष्मी चिरकाल के लिए विद्यमान होती है।लक्ष्मी की नवकलाएँ निम्नलिखित हैं :

विभूति : लक्ष्मी की प्रथम कला के विकसित होने पर मनुष्य कर्म को ही पूजा मानकर अनासक्त्त भाव से सांसारिक जीवन व्यतीत करता है।उसके अन्दर दानशीलता सागर की लहरों की भांति उमड़ती रहती है।ज्ञान ,औषधि ,अन्न ,जलादि के दान तथा परोपकार की जो कर्तव्यनिष्ठा है ,वह लक्ष्मी की विभूति नामक पीठिका है।

नम्रता : इस कला का उदय विभूति कला के पूर्णरूपेण धारण करने पर ही होता है।मनुष्य जितना नम्र स्वभाव का होता है ,लक्ष्मी उसे उतना ही ऊंचा  उठाती है।उसके अन्दर विशिष्ट पात्रता का विकास होता है।जिसमें कान्ति  के बीज अंकुरित होने लगते हैं।यह लक्ष्मी की दूसरी कला कही गयी है।

कान्ति : जब मनुष्य के अन्दर विभूति और नम्रता –इन दोनों कलाओं का विकास परिपक्व हो जाता है ,तो वह लक्ष्मी की तृतीय कला कान्ति का पात्र हो जाता है ,उसके मुखमंडल पर एक तेज आ जाता है।उसकी आँखों में चिंतन की गंभीरता ऐसे नजर आती है ,जैसे सागर की गहराई। उसकी बातें वजनदार होती हैं और उसके अन्दर आदर्शता की ज्योति नजर आती है।

तुष्टि : जब मनुष्य के अन्दर तुष्टि नामक कला का अभ्युदय होता है ,तो उसके फलस्वरूप वाणी सिद्धि,व्यवहार कुशलता ,आचरण गति ,नवोन्मेष कार्य ,दिव्यता का भाव –सभी उसमें एक रस होते हैं।

कीर्ति : जब मनुष्य के अन्दर इस कला का आगमन होता है ,तो वह संसार के आधार का अधिकारी बन जाता है।तभी तो कहा है –“खुदी को कर बुलंद इतना………………………और आगे है कि “सूरत से कीरति भली बिना आँख उडि जाय।सूरत तो जाती रहे कीरति कबहूँ ना जाय। इसकी प्राप्ति होने पर मनुष्य अपने जीवन में धन्य हो जाता है।

सन्नति : इसका अर्थ है –जीवन का परम लक्ष्य।और मनुष्य को इस संसार में कीर्ति मिल गयी तो समझो उसका लक्ष्य परिपूर्ण हो गया। जिनका परम सौभाग्य होता है वही इस अमूल्य रत्न को प्राप्त कर पाते हैं।मनुष्य की आंतरिक परिपूर्णता का नाम ही सन्नति है।जो कीर्ति नामक लक्ष्मी की पांचवी कला के प्राप्त होने पर मुग्ध होकर विराजमान होती है।

पुष्टि : इस कला का विकास होने पर मनुष्य अपने जीवन में संतुष्टि अनुभव करता है।उसे अपने जीवन का सार मालूम पड़ता है।फिर वह सांसारिक अभीप्साओं को पीछे छोड देता है।

उत्कृष्टि : इस कला का विकास होने पर जीवन में जो क्षयकोष होता है ,वह समाप्त हो जाता है।केवल वृद्धि ही वृद्धि होती है।

ऋद्धि : सबसे महत्वपूर्ण कला ऋद्धि पीठाधिष्ठात्री है ,जो भौतिक सम्पदा के परिपूर्ण होने पर स्वत: ही समाविष्ट हो जाती है –जिसे आत्मिक लाभ कहते हैं।

वस्तुतः जिस प्रकार विभिन्न नदियों के जल अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में विलीन हो कर भी समुद्र को विचलित नहीं करते हुए ,उसमें समाहित हो जाते हैं ,वैसे ही मनुष्य को जीवन में सभी भोग प्राप्त करते हुए भी विकार उत्पन्न नहीं करने चाहियें ,विकार रहित पुरुष ही पूर्णता प्राप्त कर सकता है ,परम शान्ति का अनुभव कर सकता है।

इसी प्रकार मन रुपी समुद्र का मंथन आवश्यक है और मंथन करने के लिए परिश्रम आवश्यक है।इतना परिश्रम कि देव व दैत्यों की तरह मंदाचल जैसे विशाल पर्वत को भी मथानी बना लिया गया।परिश्रम के साथ जब विचार शक्ति को प्रयोग में लाया जाता है तो मनुष्य के जीवन में भी रत्नों की उत्पत्ति हो सकती है।