वक्त कि मांग है कि मानवता का पुनर्जीवन हो :-

ये बड़ा ही सोचने का विषय है कि हमारी मानवता कि अवधारणा को क्या हुआ है ? क्या हम दिन-प्रतिदिन ज्यादा अमानवीय बन रहे हैं ?यदि ऐसा नहीं है तो क्यूँ कुछ व्यक्ति इस हद तक नीचा गिर जाते हैं कि उनको मानव समझने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती?

अपने समाज को देखने पर हम पाते हैं कि हमारे आस-पास व्यक्तियों में नैतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास हुआ है।हमारा समाज यूँ तो शिक्षा के क्षेत्र में ,विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ,आराम और सुविधाओं आदि में आगे बढ़ा है लेकिन साथ-ही साथ उसमें स्वार्थपरता और शोषण कि भावना भी दिन-प्रतिदिन बदती जा रही है।

ये वास्तव में मानव जाति के लिए चिंता का विषय है,जिसके नतीजे के फलस्वरूप लोग किसी भी कुकर्म के खिलाफ आवाज उठाना भूल गए हैं।वे केवल जब ही आवाज उठाते हैं जब ऐसा उन के खुद के साथ हो रहा होता है।ऐसी संकुचित मानसिकता हमें वास्तविक मनुष्य होने से अलग कर रही है।

लोग किसी अन्य पर जुल्म होते देख कर या तो चुप चाप वहाँ से चले जाते हैं या रुक कर उस जुल्म का आनंद उठाते हैं।वो सताए गए पर हँसते हैं और कभी कभी सताने का हिस्सा भी बन जाते हैं।

ऐसे लोग इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना भी जरूरी नहीं समझते क्योंकि ऐसा उन के साथ नहीं हो रहा होता।इस तरह के अमानवीय व्यवहार के अनेकों उदाहरण हम अपने आस पास रोजाना देखते हैं।ऐसे व्यक्ति खुद तो भीड़ का हिस्सा बन कर अमानवीयता का मजा लेते हैं पर जब अपने पर आती है तो मदद कि गुहार लगाते हैं।

स्मार्ट व्यक्ति अक्सर बिना किसी प्रयास के दूसरों का शौषण करते हैं।वे आसानी से दूसरों कि भावनाओं के साथ,उनके विश्वास के साथ,उनकी आस्थाओं के साथ खेलते हैं और उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं।

लेकिन इसका अर्थ ये बिलकुल नहीं है कि कोई उम्मीद नहीं बची है क्योंकि ये सच है कि अंत में नेकनीयती ही जीतती है।

एक मानव जैसा दिखना ही वास्तविक मानव बनने के लिए काफी नहीं है।ये एक खुद से सीखने कि प्रक्रिया है जो हर किसी को पूरी ईमानदारी के साथ ,पूरी जिन्दगी अपनानी चाहिए।

वस्तुतः मानवता का पुनर्जीवन आधुनिक समाज में भी संभव है।लेकिन इसके लिए हमें इस प्रक्रिया में पूरे मन से और विश्वास से अग्रसर होना होगा।