वचनामृत :१०

मनुष्य जैसा जीवन व्यतीत करता है ,वैसे ही उसके विचार हो जाते हैं।   -मैक्सिम गोर्की

अर्थात् यदि हम बुरे व्यक्तियों के साथ रहेंगे तो धीरे -धीरे बुरे हो जायेंगे और हमारे दिमाग पर  बुरे विचार हावी हो जायेंगे लेकिन यदि हम सज्जन लोगों का साथ करते हैं और उन के सानिध्य में रहते हैं तो हमारे विचार भी पवित्र हो जाते हैं।इसलिए सदा अपने आप को सज्जन लोगों की सोहबत में रखना चाहिए।

प्रत्येक मनुष्य में हिंसा की एक बड़ी लकीर होती है।यदि इसे समझा और नियंत्रित नहीं किया जाता ,ये एक जंग या पागलपन में फ़ैल जायेगी। -सैम पेच्किंपः

अर्थात् हालांकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है किन्तु हिंसा की भावना उस में कूट-कूट कर भरी होती है।यदि इस भावना को नियंत्रित नहीं रखा गया तो एक दिन ये बाहर आ जायेगी और एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते-फैलते अराजकता बन जायेगी।

रहस्य ,जिन्हें एक समय, अलौकिक या असाधारण घटनायें समझा जाता था –जैसे खगोलीय और मौसम संबंधी    घटनायें –विज्ञान में शामिल हो जा रही हैं एक बार जब उनका कारण समझ आ जाता है। -माइकल शेर्मेर

अर्थात्  कभी भी बिना सोचे विचारे किसी भी घटना को असाधारण या अलोकिक नहीं कहा जा सकता।पहले इसे परिक्षण की कसौटी पर परखना चाहिए और तब हमें पता चलता है की हर घटना का कोई न कोई कारण होता है।कहने का अर्थ है अंधविश्वास नहीं करना चाहिए ।

आदमी खुद को विकसित कर रहा है,जब वह बढ़ता है या कमाता है ,इतना कि खुद को और अपने परिवार को ,एक सम्मानीय स्थिति प्रदान कर सके। वह विकसित नहीं किया जाता यदि कोई अन्य उसे ये सब चीजें दे दे। –जूलियस ‘म्वालिमु’ न्येरेरे ,तंज़ानिया

अर्थात् जब हमें बिना कुछ मेहनत किये ही सब कुछ मिल जाए तो हम तरक्की कैसे करेंगे।किन्तु यदि हम खुद कुछ करते हैं तो जीवन के लिए नए-नए रास्तों की खोज कर पाते हैं और इस प्रकार न केवल स्वयं के लिए अपितु औरों के लिए भी असीमित संभावनाएँ खोल देते हैं ।

वर्गीय हितों और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं से ऊपर उठकर, अपने आदर्श की रौशनी में ,जिनकाआप प्रतिनिधित्व करने वाले हैं ,अपनी कार्रवाई के मूल्य का निर्धारण करना सीखें।भौतिकता से आत्मिकता की ओर चलें ।भौतिकता बिखराव है ;आत्मिकता रोशनी है ,जीवन है ,एकात्मकता है । -मुहम्मद इकबाल

अर्थात्  हमेशा इस बात को सोचें कि जो आप कर रहे हैं वह केवल आपके व्यक्तिगत लाभ के लिए है या सम्पूर्ण मानव जाति के लाभ के लिए है।यदि यह स्वयं के लाभ के लिए है तो तुच्छ है किन्तु यदि यह समाज के लाभ के लिए है तो उत्तम है।नश्वर भौतिक वस्तुओं के पीछे भागने की बजाय आत्मिक बातों के पीछे जैसे परोपकार ,पर सेवा आदि के पीछे भागने से हमारे जीवन में पवित्रता का प्रकाश आता है।

सच्चा आत्मसम्मान इस बात को खोजने से आता है कि आप वास्तव में अनंत आत्मा हैं , असीम और सनातन । एक बार जब आप अपनी  आवश्यक प्रकृति के लिए जागृत हो जाते हैं ,तो आप अहंकार की जंग को जाने देते हैं जो आत्म मूल्यांकन  के लिए एक बाहरी भावना के  निर्माण के लिए होती है । -दीपक चोपडा

अर्थात्  अक्सर हम लोग जो कुछ भी करते हैं उसके लिए स्वयं को ही बढाई देते हैं।हम हमेशा मैं -मैं करते रहते हैं जबकि वास्तविक कर्ता तो आत्मा है ।शरीर तो आत्मा का घर है और हम शरीर नहीं केवल आत्मा हैं ,जो इस बात को जान लेता है उसी  को सच्चा आत्मसमान मिलता है।

मैं चकित कर दिया गया था  कि व्यक्ति अपने धर्म के लिए शहीद की मौत मर सकता था  –मैं इस पर थरथरा चुका हूँ,मैं अब नहीं कंपकंपाता ।मैं भी धर्म के लिए शहीद हो सकता था ।प्यार मेरा धर्म हैऔर मैं इस के लिए मर सकता हूँ … –जॉन कीट्स

अर्थात्  वास्तविक धर्म तो प्यार है ।लोग अक्सर इस बात को नहीं समझते और अक्सर ईर्ष्या ,द्वेष और पर धर्मों के प्रति कटुता के चलते लोगों को मौत के घाट उतारते हैं ,जिहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाते हैं और खुद को शहीद बताते हैं ।वास्तव में ये धर्म नहीं है क्योंकि धर्म तो प्यार और मानवता का पाठ पढाता है।