वचनामृत:४

बुद्धिमत्ता का सच्चा लक्षण ज्ञान नहीं बल्कि कल्पना–शक्ति है।अल्बर्ट आइंस्टीन

अर्थात् जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं तब हम बुद्धिमान बनते हैं लेकिन जिस प्रकार ठहरा हुआ पानी सड जाता है और उस में काई जम जाती है उसी प्रकार जब हम अपनी बुद्धिमानी का उपयोग कुछ नया करने में नहीं करेंगे या अपने मष्तिष्क का उपयोग नहीं करेंगे तो वो भी धीरे-धीरे जंग खाने लगेगा और हमारी सोचने-विचारने की शक्ति मंद पड़ जायेगी।वहीँ जब हम अपने दिमाग का उपयोग कल्पना करने और नए –नए आविष्कार करने या नए विचारों को प्रस्तुत करने में लगायेंगे तो हमारी बुद्धि का और ज्यादा विकास होगा।इसलिए बुद्धिमत्ता का सच्चा लक्षण ज्ञान नहीं बल्कि कल्पना शक्ति है ।

सफलता है–अपने मष्तिष्क को जगाये रखना और अपनी इच्छाओं को सोने देना।वाल्टर स्कॉट

अर्थात् जब हम अपनी इच्छाओं को ,कामनाओं को त्याग देते हैं तो हमारा मष्तिष्क अपने लक्ष्य की ओर अधिक स्पष्टता से देख सकता है क्योंकि इधर-उधर के विचार इस में नहीं आते ,तरह-तरह के प्रलोभन इसे अपनी तरफ आकर्षित नहीं करते।जब हमारा मष्तिष्क हमारे लक्ष्य पर केन्द्रित होगा तो उस लक्ष्य को प्राप्त करना भी हमारे लिए सुगम हो जाएगा।इसलिए अपनी कामनाओं को ,इच्छाओं को सुला कर अपने मष्तिष्क को जगाये रखो अर्थात् केन्द्रित रखो।

आइये हम उठें और धन्यवाद करें कि चाहे हमने आज बहुत कुछ न सीखा हो पर कम से कम कुछ तो सीखा है ,और यदि थोडा सा भी नहीं सीखा है तो कम से कम हम बीमार तो नहीं पड़े और यदि हम बीमार पड़े तो कम से कम हम मरे तो नहीं ।अतैव हम सभी कृतज्ञ बनें।गौतम बुद्ध

अर्थात् सभी परिस्थितियों में उस परम-पिता परमेश्वर का धन्यवाद करते रहना चाहिए और उस के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन करते रहना चाहिए क्योंकि उस ने ही हमें इस जीवन में जीने के सम्पूर्ण साधन दिए हैं।जितने की हमें जरूरत होती है उतना हमें प्राप्त होता है।हमेशा अपने से नीचे को देखिये ,जितना हमें मिला है उतना तो उनको भी नहीं मिला।अगर भगवान् ने आपको केवल एक हाथ ही दिया है तो भी किसी को तो एक भी नहीं है ।कहने का अर्थ है कि सब को कुछ न कुछ तो मिला ही है और भगवान् सब को उतना ही देता है जितना जरूरी होता है ।इसलिए संतुष्ट रहें और कृतज्ञ रहें ।

आप कितने ही पाप करते हैं,अपनी इच्छाओं और माया की चाह में।आपका शरीर रेत का ढेर बन जाएगा;मृत्यु अंत में आप पर विजय पा लेगी।अपने यौवन और अपनी संपत्ति को छोड़ कर आप को खाली हाथ ही जाना पडेगा।गुरु ग्रन्थ साहिब

अर्थात् हमें पाप कर्म नहीं करने चाहिए।लोग पाप कर्मों के द्वारा ,झूठ बोल कर ,रिश्वत खा कर,किसी गरीब को लूट कर धन संपत्ति बनाते हैं ।लोग अपनी इन्द्रियों के वशीभूत हो कर तरह तरह की विषय-वासनाओं में जकड़े रहते हैं ।पर अंत समय ये शरीर राख का ढेर बन जाएगा।साथ इकठ्ठा किया हुआ धन भी नहीं जाएगा ।साथ हमारे कर्म ही जाते हैं और फिर उनका हिसाब होता है।बुरे कर्मों को करने वाले भयानक नरक जैसी यातनाओं को भोगते हैं और जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं जबकि सत्कर्म करने वाले जन्म-मरण के चक्र से निकल कर भगवत्धाम को प्राप्त करते हैं।इसलिए सदा सत्कर्म करते रहिये ।

यदि आप उनको प्यार करते हैं जो आप को प्यार करते हैं तो इसका आप को क्या श्रेय जाता है? यहाँ तक की पापी भी उन्हें प्यार करते हैं जो उन्हें प्यार करते हैं ,और यदि आप उस के लिए अच्छा करते हैं जो आप के लिए अच्छा करता है  तो इसमें आप को क्या श्रेय जाता है? –जीसस क्राइस्ट

अर्थात् जरूरी नहीं है कि जब कोई हमारे लिए करे तब ही हम उस के लिए कुछ करें।एक सज्जन पुरुष के लक्षण हैं कि वो सभी के लिए समान रूप से कुछ न कुछ करता रहता है।असली श्रेय तो तब है जब उन के लिए करें जो हमारे लिए कुछ नहीं करते,उन्हें प्यार करें जो हमें नहीं करते ,अच्छा करें लेकिन प्रत्युतर में बिना कुछ चाहे।कहने का अर्थ है ऐसे कर्म जो बिना फल की इच्छा के किये जाएँ वही श्रेष्ठ कर्म हैं।