वचनामृत:५

जब आप एक मुश्किल स्थिति में हों और सब कुछ आप के खिलाफ़ जा रहा हो,उस वक्त जब ऐसा लग रहा हो कि आप और बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे,कभी भी हथियार न डालें क्योंकि यही वो वक्त और समय होगा जब कि ज्वार आएगा अर्थात् आप के जीवन में तरक्की होगी)।हेरिएट बीचर स्तोवे

अर्थात् सफलता और असफलता में केवल दो कदम का फासला होता है।अक्सर व्यक्ति मुश्किल परिस्थितियों से घबरा जाता है और ठीक उस वक्त हथियार डाल देता है जब जीत उससे कुछ ही फासले पर होती है।अगर व्यक्ति थोड़ी सी और हिम्मत जुटा ले तो कुछ क्षण बाद ही पायेगा कि उसने सफलता प्राप्त कर ली है और तरक्की की ओर अग्रसर है।इसलिए धैर्य बनाए रखें और सफल बनें।    

यदि कोई तुम से बेहतर है,तो उनसे सीखो;दूसरों की सफलता का आनंद लो।किसी के अन्दर भी सभी विशेषताएं नहीं हो सकती।कोई न कोई किसी न किसी स्तर पर हमेशा हमसे बेहतर हो सकता है।अपने आप को इस तुलना का कोड़ा न मारें।स्वामी सुखबोधानन्द

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई खासियत होती है।किसी क्षेत्र में आप ज्यादा बेहतर होते हैं और किसी क्षेत्र में कोई और बेहतर होता है।कोई भी सभी क्षेत्रों में बेहतर नहीं हो सकता।इसलिए दूसरों से तुलना कर के कभी भी अपने आप को कमतर नहीं आंकना चाहिए।आप कहीं न कहीं दूसरों से बेहतर हो सकते हैं।बस इस बात की जरूरत है कि आप जिस क्षेत्र में अन्यों से कम हैं उस क्षेत्र में उन से सीखने का जज्बा रखें और सीखते रहें ।ऐसा करने के लिए ये भी जरूरी है कि आप उनकी सफलता से खुश हों न कि उन से जलें ।       

पुण्य अच्छे कर्मों से प्रकट होता है और ज्ञान एक शुद्ध और शांतिपूर्ण मन से प्रकट होता है।मानव जीवन की भूलभुलैया से सुरक्षित रूप से गुजरने के लिए,हरेक को ज्ञान का प्रकाश और पुण्य के मार्गदर्शन की जरूरत है।गौतम बुद्ध

अर्थात् जिस प्रकार हम थोडा थोडा बैंक में जमा करते रहते हैं उसी प्रकार जब व्यक्ति सत्कर्म करता है ,दूसरों की सेवा करता है ,मानवमात्र के कल्याण में लगा रहता है तो उसे पुण्य की प्राप्ति होती है अर्थात् उसके विचार शुद्ध हो जाते हैं ,उसकी आत्मा पवित्र हो जाती है और वो मोक्ष को प्राप्त कर भगवत्धाम का अधिकारी हो जाता है।ठीक उसी प्रकार जब पुण्य के प्रताप से हमारा मन शांत और शुद्ध हो जाता है तो हमें ज्ञान अर्थात् प्रभु भक्ति का प्रकाश प्राप्त होता है।    

सतत प्रयास,ना कि शक्ति या बुद्धि,हमारी क्षमता का ताला खोलने की कुंजी है।विंस्टन चर्चिल 

अर्थात् चाहे हम में कितनी भी शक्ति क्यूँ न हो ,चाहे हम बहुत ही बुद्धिमान क्यूँ न हों यदि हम में आगे बढने का जज्बा नहीं है तो हम आगे नहीं बढ़ सकते।जीवन की राह में कई मुश्किलें आती हैं।हम उन से घबरा कर रुक सकते हैं ,उस काम को  छोड सकते हैं या फिर साहस जुटा कर फिर से प्रयास कर सकते हैं।जिस प्रकार बार-बार कुँए से पानी निकालते वक्त उसकी रस्सी से घिस कर पत्थर पर निशान पड़ जाते हैं उसी प्रकार सतत प्रयास से हम खुद में छुपी हुई क्षमता को उजागर कर सकते हैं और सफलता की सीढ़ी चढ़ सकते हैं।

हम अपने विचारों के द्वारा रचित होते हैं,हम वैसे ही बन जाते हैं जैसा सोचते हैं। जब हमारा मस्तिष्क पवित्र होगा,ख़ुशी उस परछाई की तरह अनुसरण करेगी जो कभी साथ नहीं छोडती।बुद्ध

अर्थात् जैसी मिटटी होती है वैसा ही बर्तन बन जाता है।उसी प्रकार जैसे विचार होंगे हमारे कर्म भी वैसे ही होंगे।विचार भी मिटटी की भांति ही हमारे आचरण को गढ़ते हैं।अगर विचार अच्छे होंगे हमारा आचरण अच्छा होगा और विचार गंदे होंगे तो हमारा आचरण भी गन्दा होगा।जब हमारे विचार अच्छे होंगे तो हमारा मस्तिष्क पवित्र होगा ,जब मस्तिष्क पवित्र होगा तो हम आनंदित और शांत रहेंगे और ये आनंद चिरस्थाई होगा।