वचनामृत:६

आपके जीवन में जो कुछ भी अच्छी या बुरी घटना होती है उसमें आप किसी न किसी हद तक जिम्मेदार होते हैं,इन अनुभवों से सीखने और आगे बढ़ने के लिए ,आपको हर घटना में निभाया गया आपका किरदार स्वीकार करना होगा।–ए० सी० एंडरसन

अर्थात् प्रत्येक के जीवन में अच्छी या बुरी दोनों तरह की घटनाएँ होती हैं।दोनों तरह की घटनाओं के लिए व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है।जीवन में जिस प्रकार हम व्यवहार करते हैं ये उसका परिणाम होता है कि हमारे साथ अच्छा घटेगा या बुरा।हम अक्सर अपनी गलतियाँ छुपा जाते हैं या उस घटना में अपनी जिम्मेदारी से मुकर जाते हैं।जबकि हमें उन घटनाओं से सीखना चाहिए और उस में की गयी अपनी गलती से सबक ले कर भविष्य में वो गलती नहीं करनी चाहिए ताकि हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकें।      

कुछ भी कहने से पहले विचारें–ये जो मैं बोलने जा रहा हूँ,क्या ये मुझे खुद कि पीड़ा कि और ले जाएगा या औरों की या दोनों की?क्या ये असावधानी से बोला जाने वाला वक्तव्य होगा जिसके परिणाम दुखदायी होंगे?गौतम बुद्ध

अर्थात् तोल-मोल के बोल।कभी कभी हम जाने अनजाने ऐसे शब्द बोल जाते हैं जो दूसरों को बहुत ही चोट पहुंचाते हैं।कभी-कभी इसका परिणाम ये भी होता है कि वो व्यक्ति हमारा शत्रु बन जाता है और हमें नुक्सान पहुँचाने में लग जाता है।कभी-कभी हम बाद में अपने द्वारा बोले शब्दों पर ग्लानि भी महसूस करते हैं।दोनों ही परिस्थितियों में हमें खुद भी पीड़ा होती है और हम दूसरे को भी पीड़ा पहुंचाते हैं।इसलिए हमेशा सावधानी पूर्वक बोलना चाहिए और बोलने से पहले सोच लेना चाहिए कि इससे किसी को कोई नुक्सान या पीड़ा तो नहीं पहुंचेगी।       

एक पहाड़ धरती के छोटे-छोटे कणों से मिल कर बना है।महासागर पानी की छोटी-छोटी बूंदों से मिल कर बना है।इसी प्रकार जीवन कुछ नहीं है बल्कि छोटे-छोटे विवरणों ,कार्यों, भाषणों और सोचों कि एक अंतहीन श्रृंखला है।स्वामी सिवानन्द

अर्थात् विश्व की सारी वस्तुएँ छोटी-छोटी चीजों के संगम से बनी हैं।हमारे जीवन में हर क्षण कोई न कोई घटना घटती रहती है।हम हर पल कुछ न कुछ करते रहते हैं,कुछ न कुछ सोचते ,विचारते रहते हैं,कुछ न कुछ कहते रहते हैं।इन सब से मिल कर ही हमारा जीवन बनता है और यूँ ही गुजर जाता है।कहने का अर्थ ये है कि इसलिए हमें अपना प्रत्येक क्षण सात्विकता से ,प्रत्येक विचार पवित्रता से ,प्रत्येक बोल मिठास से भर देना चाहिए ताकि हमारा जीवन सार्थक हो सके।    

तुम्हारे पास दो रुपये हों तो एक की रोटी खरीदो ,दूसरे की अच्छी पुस्तक।रोटी जीवन देती है और अच्छी पुस्तक जीवन कला।अज्ञात

अर्थात् पुस्तकें हमारी पथ प्रदर्शक होती हैं।हमारे भविष्य निर्माण में ये एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं।ये हमें ज्ञान देती हैं ,आगे बढ़ने का होंसला देती हैं,हमें अच्छे-बुरे की पहचान कराती हैं।जहाँ रोटी से हमारे शरीर की भूख मिटटी है वहीँ पुस्तकों से हमारे दिमाग की भूख शांत होती है।इसलिए पुस्तकें जरूर पढनी चाहियें।     

दुर्भाग्य कभी आप के पीछे हाथ धोकर पड जाए,ऐसा लगने लगे कि कोई उपाय प्रगति पथ पर स्थिर रखने में समर्थ नहीं है,चारों और असफलता ,अन्धकार  ही अंधकार  प्रतीत हो रहा हो,तब आप महापुरूषों के ग्रन्थ पढें,जीवन ज्योति मिलेगी। – पंडित श्री राम शर्मा

अर्थात् जब हम महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़ते हैं तो पाते हैं कैसे उन्होंने कठिन परिस्थितियों से गुजर कर खुद को प्रगति पथ पर अग्रसर रखा और एक साधारण मनुष्य से महापुरुष बन गए।इस प्रकार उन के जीवन से हम प्रेरणा ले कर स्वयं को सक्षम कर सकते हैं कि चाहे कितनी भी परेशानी आये ,दुर्भाग्य कितना भी हमारा पीछा करे,कितना भी अन्धकार महसूस हो रहा हो और कोई राह न सुझाई दे रही हो, हम बिना डरे अपना कर्म करते रहेंगे और प्रगति पथ पर बढ़ते रहेंगे।