विचारणीय:१३

परिस्थितियों को यों ही छोड दिया जाए तो वे ठीक नहीं हो जातीं।-हक्सले

अर्थात् हमें सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड कर नहीं बैठ जाना चाहिए।खेत में भी फसल तब तक नहीं उगती जब तक कि उसमें हल न चलाया जाए,बीज न बोया जाए,समय-समय पर पानी और खाद न दी जाए और फसल का ध्यान न रखा जाए।इसी प्रकार किसी भी परिस्थिति को यों ही छोड देने से उसमें परिवर्तन नहीं होता।किसी भी परिस्थिति को ठीक करने के लिए प्रयास करते रहना जरूरी है।बिना प्रयास किये कुछ भी ठीक नहीं होता और यदि प्रयास करते रहें तो एक दिन हम परिस्थितियों में बदलाव ला सकते हैं।इसलिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

जो एकदम बहुत कुछ कर डालने की प्रतीक्षा में है,वह कभी कुछ नहीं कर पायेगा।-सैम्युएल जॉनसन

अर्थात् जो दो नावों पर सवार रहते हैं वो कभी पार नहीं उतर सकते।इसी तरह एक ही समय पर कई काम हाथ में लेने से कोई भी काम ठीक ढंग से और सफलतापूर्वक नहीं होगा क्योंकि हमारा ध्यान उन सभी को पूरा करने में लगा रहेगा।वहीँ यदि हम किसी एक काम को हाथ में लेंगे तो उसी पर ध्यान केन्द्रित रहेगा और वो काम सफलतापूर्वक और समय पर हो जाएगा।इसलिए बहुत कुछ एक ही समय पर कर डालने की इच्छा से बचना चाहिए और धीरे धीरे मजबूत क़दमों से सफलता की ओर बढ़ना चाहिए।

संसार में आदरपूर्वक जीने का सबसे सरल और शर्तिया उपाय यह है कि हम जो कुछ बाहर से दिखना चाहते हैं,वैसे अन्दर से भी हों।-सुकरात

अर्थात् आदर केवल उसी का होता है जो सज्जन होता है,परोपकारी,उदार और सबके काम आने वाला होता है।प्रत्येक व्यक्ति ये चाहता है कि उसका आदर-सम्मान हो और इसके लिए वो दान करता है,बाहर से दयालु दिखने का यत्न करता है।बाहरी सुन्दरता के कोई मायने नहीं हैं।यदि हम बाहर से तो दयालु और अच्छा दिखने का प्रयास करते हैं लेकिन भीतर से हमारे अन्दर कपट और चालाकी भरी है तो हमारा यह प्रयास व्यर्थ है क्योंकि एक न एक दिन अन्दर की गंदगी और अवगुण बाहर निकल कर आ ही जायेंगे।लोग भी ऐसे व्यक्ति  को ही प्यार करते हैं जो जैसा भीतर से है वैसा ही दिखाता है।यदि हम चाहते हैं कि लोग हमें सज्जन,दयालु,सबके काम आने वाला मानें और हमारी इज्जत करें तो हमें पहले ये विचार और गुण अपने जीवन में उतारने होंगे।

उस तुच्छ व्यक्ति का चित्त कभी प्रसन्न नहीं हो सकता जिसने पैसे की खातिर अपना ईमान बेच दिया।-सादी

अर्थात् ईमानदारी से बड़ी कोई चीज नहीं है।लेकिन कभी-कभी परिस्थितिवश व्यक्ति बेईमान हो जाता है।वो चंद रुपयों की खातिर अपना ईमान बेच देता है।वो ऐसा कर के सोचता है कि उसे कोई देख नहीं रहा किन्तु उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती रहती है।उसे रात-दिन अपने किये का डर रहता है और वो अपने किये पर पछताता भी है।ऐसा व्यक्ति तुच्छ के समान है जो हमेशा दुखी और चिडचिडाहट भरा रहेगा।उसका चित्त कभी भी प्रसन्न नहीं होगा।इसलिए चाहे जैसी भी परिस्थिति हो व्यक्ति को अपना ईमान नहीं बेचना चाहिए।

पवित्र उदारता प्रत्युपकार की भावना रखे बिना परोपकार करती है।-स्वैन्ड़ेनबर्ग

अर्थात् जब किसी की मदद की जाए और बदले में ये आशा रखी जाए कि सामने वाला भी हमारे लिए कुछ करे तो ये कोई परोपकार नहीं है अपितु एक तरह का व्यापार है जहाँ लेन-देन की भावना होती है।जिन लोगों का मन कलुषित होता है वे लोग दूसरे की मदद तब करते हैं जब उन्हें उस से कोई फायदा होने वाला हो या आगे चल कर इस उपकार के बदले वे उससे कोई काम कराना चाहते हों अर्थात् उस व्यक्ति को अपने एहसान तले दबाना चाहते हों।जब किसी का मन पवित्र होता है तो वह बिना ये सोचे कि भविष्य में मैं इस से कोई फायदा उठाउँगा या कोई काम कराऊँगा उस व्यक्ति की मदद करने लगता है।वो मदद कर के उस व्यक्ति पर एहसान नहीं जताता।इस प्रकार की पवित्र उदारता बिना प्रत्युपकार की भावना रखे परोपकार करती है।