विचारणीय:१४

सदैव प्रसन्न रहो।इससे मस्तिष्क में अच्छे विचार आते हैं और चित्त शुभ कामों की ओर लगा रहता है।-टैगोर

अर्थात् जब हम प्रसन्न रहते हैं तो हमें किसी से भी कोई शिकायत नहीं होती।जब कोई शिकायत नहीं होती तो किसी के भी प्रति दुर्भावना उत्पन्न नहीं होती।दुर्भावना से ही क्रोध उत्पन्न होता है।जब क्रोध नहीं होता तो मन शांत रहता है और व्यक्ति दूसरों के हित की कामना करने लगता है और सदगुणों से भर जाता है।

प्रसन्न रहने से,मन में अच्छे विचार आने से उसका मन दूसरों की भलाई की और लग जाता है और इस प्रकार व्यक्ति के लिए मोक्ष का द्वार खुल जाता है।प्रसन्न रहने से व्यक्ति पर आया कठिन समय भी आसानी से गुजर जाता है और शांत चित्त होने से व्यक्ति कठिनाईयों से निबटने का रास्ता भी आसानी से खोज लेता है।इसलिए व्यक्ति को सदा प्रसन्न रहना चाहिए।

जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है,वही दूसरों के क्रोध से बच सकता है।-सुकरात

अर्थात् कभी-कभी जब व्यक्ति को वजह-बेवजह क्रोध आ जाता है तो उसके सोचने समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है और वो जो भी सामने आ जाता है उसी पर अपना क्रोध उतारने लग जाता है।जिस प्रकार आग में घी डाल देने से आग और भड़क उठती है उसी प्रकार जिस व्यक्ति पर क्रोध उतारा जाता है,वो व्यक्ति भी क्रोधित हो उठता है और अपना क्रोध पहले वाले व्यक्ति पर उतार डालता है।इस प्रकार आपस में तकरार बढती ही जाती है।

क्रोध करना,क्रोध को बढाता ही है।इन सब से बचने का उपाय ये है कि क्रोध को पी लिया जाए अर्थात् अपने ऊपर ही झेल लिया जाए।कभी-कभी व्यक्ति ग़लतफहमी का शिकार हो कर भी क्रोध कर बैठता है और कभी-कभी किसी अन्य की गलती के कारण क्रोधित होता है।पर यदि कुछ क्षण के लिए उस क्रोध को अपने अन्दर ही रोक लिया जाए तो कुछ क्षण बाद ही व्यक्ति पायेगा कि या तो वो बेवजह ही क्रोधित हुआ था या गलती करने वाला अपनी गलती के लिए शर्मिंदा हो रहा है।वहीँ यदि व्यक्ति अपना क्रोध दूसरे पर निकाल देगा तो क्रोध की बढोतरी ही होगी।

प्रत्येक व्यक्ति अपने मत को सच्चा और अपने बच्चों को अच्छा समझता है लेकिन इसलिए दूसरे के मत या बच्चे को बुरा कहना उचित नहीं है।-सादी

अर्थात् अपनी वस्तु और बच्चे हर किसी को प्यारे लगते हैं,अपने विचार हर किसी को श्रेष्ठ लगते हैं।इसमें कोई बुराई भी नहीं है किन्तु यदि आप इस के लिए अन्य के बच्चे को बुरा कहोगे या उसके विचारों को या धर्म को बुरा कहोगे तो उस व्यक्ति को कितना बुरा लगेगा,कभी इस बारे में भी सोचा है।कभी-कभी ऐसा करने से टकराव और लड़ाई तक की भी नौबत आ जाती है।

कभी कल्पना की है यदि कोई आप के मत को झूठा और आपके बच्चों को बुरा बताये तो आपको कैसा महसूस होगा।आप कितना बुरा महसूस करेंगे।जब आप अपने मत को सच्चा और अपने बच्चों को अच्छा समझते हैं तो दूसरा अपने मत को सच्चा और अपन बच्चों को अच्छा क्यों नहीं समझ सकता।इसलिए कभी भी दूसरे के मत या बच्चे को बुरा मत कहो।

जिसे समझ है वह जानता है कि विद्धता नहीं,बल्कि उसे उपयोग में लाने की कला का नाम ज्ञान है।-स्टील

अर्थात् केवल विद्वान होने से कुछ नहीं होता।जिस प्रकार खेत में केवल बीज डालने से यदि हम ये सोच लें क्योंकि बीज का काम तो पनपना है इसलिए ये अपने आप पनप जाएगा तो ऐसा नहीं है।उसे पानी,खाद आदि की जरूरत होती है।इसी प्रकार हम जानते हैं कि चावल खाने की चीज है पर वो तब तक नहीं खाए जा सकते जब तक कि उनको पकाया न जाए।हमारे पास वाहन है पर हम उसे चलाना नहीं जानते तो वो हमारे लिए बेकार ही है।इसी प्रकार जब हम अपनी विद्धता को उपयोग में लाना जानते हैं तो यही जानना,वास्तविक ज्ञान है।

हमारा दूसरे लोगों के साथ जो सम्बन्ध होता है,प्राय: उसी से हमारे सभी शोक और दुखों का जन्म होता है।-शोपेन हावर

अर्थात् व्यक्ति जब इस दुनिया में आता है तो वो नश्वर रिश्ते जोड़ लेता है।कोई उसके माता-पिता,कोई उसका भाई,कोई बहिन,कोई बीवी बन जाता है।इसी तरह वो यार-दोस्त और सहयोगी बनाता है।जब व्यक्ति ऐसा करता है तो इनसे जुड़ जाता है,प्रेम करने लगता है और इनसे अपेक्षा करने लगता है।कभी-कभी जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं होती तो उसे गहरा झटका लगता है और उसे दुःख की प्राप्ति होती है।इसी प्रकार जब कोई अपना सम्बन्धी,मित्र,सहयोगी गुजर जाता है तो व्यक्ति को अपार दुःख और शोक होता है क्योंकि वह इन को ही अपना सब कुछ मानता है।

यदि व्यक्ति ये समझ ले कि ये सभी सम्बन्ध नश्वर हैं और केवल ईश्वर के साथ ही सम्बन्ध शाश्वत है तो उसे दुःख कि प्राप्ति नहीं होगी।सब कुछ देने वाला तो वो ईश्वर है।यदि अपेक्षा रखनी है तो उस ईश्वर से रखो,इस जगत के नश्वर प्राणियों से क्यों।वैसे भी ईश्वर तो प्रत्येक की जरूरत के मुताबिक़ बिना मांगे ही दे देता है।इसलिए शाश्वत और नश्वर के बीच का फर्क पहचान कर खुद को शोकमुक्त रखना चाहिए।