विचारणीय:१५

जीवन का रहस्य ईमानदारी और निष्पक्ष व्यवहार है।यदि आप इसकी नक़ल कर सकते हो तो आपका जीवन बन जाता है।-ग्रोउचो मार्क्स

अर्थात् हमें ईमानदारी से जीवन बिताना चाहिए।यदि हम ईमानदारी से जीवन बिताएंगे और अपने आस-पास के व्यक्तियों और घटनाओं के बारे में निष्पक्ष विचार रखेंगे तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।अक्सर लोग सफल होने के लिए छोटा रास्ता चुनते हैं और बेईमानी की राह पर चल निकलते हैं।ऐसा कर के उन्हें तुरंत सफलता तो मिल जाती है पर ये सफलता स्थाई नहीं हो सकती।जिस दिन उनकी बेईमानी का भांडा फूटता है उस दिन वे कहीं के नहीं रहते।इसलिए सदा ईमानदारी से जीवन व्यतीत करना चाहिए।

अक्सर व्यक्ति अपने फायदे के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का भी पक्ष ले लेता है जो गलत कामों में लिप्त होता है।ऐसा करके व्यक्ति स्वयं को केवल गलत कामों के गर्त में ही उतार सकता है और अंततः उसका जीवन नरक बन जाता है।पर निष्पक्ष व्यवहार हमें सही और गलत के बीच भेद करना सिखाता है।अपने फायदे की न सोच कर निष्पक्ष सोच रखने वाला व्यक्ति बेहतर तरीके से जीवन की समस्याओं का सामना कर पाता है और इस प्रकार जीवन को ईमानदारी और निष्पक्ष रूप से जी कर,सफलता की ऊंचाइयों को छू सकता है।हमें सदा ईमानदारी से और निष्पक्ष रह कर जीवन-यापन करना चाहिए।

बुद्धिमत्ता का सच्चा लक्षण ज्ञान नहीं है अपितु कल्पना-शक्ति है।–अल्बर्ट आइंस्टीन

अर्थात्  केवल ज्ञान प्राप्त करने से कोई बुद्धिमान नहीं बन जाता।जब तक हम उस ज्ञान का उपयोग नयी-नयी चीजों की कल्पना करने में नहीं लगाते,तब तक वो ज्ञान व्यर्थ है।ज्ञान का अर्थ है-नयी-नयी बातें सीखना और जो व्यक्ति अपनी कल्पना शक्ति के द्वारा नए-नए विचार और आविष्कार दुनिया को दे सकता है,वास्तव में वो ही बुद्धिमान है।इसलिए हमेशा अपनी कल्पना-शक्ति को उन्नत बनाने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।

क्या तुमने कभी ऐसे आदमी का नाम सुना है,जिसने निष्ठापूर्वक जीवन-भर प्रयास किया हो और किसी हद तक भी सफल न हुआ हो?-थोरो

अर्थात् संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो निष्ठापूर्वक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहता हो और सफल न हुआ हो।जो व्यक्ति अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ संकल्प है,वो एक बार असफल होने पर भी प्रयास करना नहीं छोड़ता।वह दूगनी ताकत के साथ पुन: प्रयास करता है और अंततः सफल हो जाता है।जिस  प्रकार बार बार पानी खींचे जाने पर पत्थर पर भी रस्सी का निशान पड़ जाता है उसी प्रकार पूर्ण विश्वास के साथ प्रयासरत व्यक्ति अपने लक्ष्य को पा ही लेता है,इसमें कोई संशय नहीं है।इसलिए हमें निष्ठा-पूर्वक जीवन-भर प्रयास करते रहना चाहिए।

दान से धन घटता नहीं,बढ़ता है।अंगूर की शाखें काटने से और ज्यादा अंगूर लगते हैं।-सादी

अर्थात् दान करने से व्यक्ति को प्राप्त धन में कमी नहीं होती,अपितु उस में वृद्धि ही होती है।यहाँ धन से तात्पर्य हमें प्राप्त पुण्य,यश और मान-सम्मान है।जब व्यक्ति किसी को दान देता है तो वो दान प्राप्तकर्ता की मदद के लिए होता है।इस प्रकार दान-कर्ता पुण्य का भागी हो जाता है।जिस व्यक्ति को दान दिया जाता है वो भी दान-कर्ता की तारीफ़ करते नहीं थकता और दान-कर्ता का सम्मान समाज में भी होता है।इस प्रकार कहा जा सकता है कि दान से धन घटता नहीं अपितु बढ़ता है। इसलिए हमेशा दान-पुण्य करते रहना चाहिए।

अत्याचारी से बढ़कर अभागा व्यक्ति दूसरा नहीं,क्योंकि विपत्ति के समय उसका कोई मित्र नहीं होता।-सादी

अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों पर अत्याचार करता है उसे कोई पसंद नहीं करता।जिस पर अत्याचार हुआ हो वो तो बिलकुल भी नहीं।ऐसा व्यक्ति भीड़ में भी अकेला ही रहता है।यदि कभी ऐसे व्यक्ति पर मुसीबत आन पड़े तो कोई भी उसकी मदद को तैयार नहीं होता क्योंकि उसने सब को कष्ट दिये होते हैं।कोई भी ऐसे व्यक्ति से मित्रता नहीं करना चाहता।इसलिए ऐसा व्यक्ति बड़ा ही अभागा होता है।अत: भूल कर भी किसी पर अत्याचार नहीं करना चाहिए।