विचारणीय:१७

लोगों में बल की नहीं संकल्प-शक्ति की कमी होती है।-विक्टर ह्यूगो

अर्थात् अक्सर देखा गया है,लोग धन संपत्ति से युक्त होते हैं।साथ ही साथ उन के अन्दर किसी भी काम को करने की शक्ति होती है फिर भी वे कोई कार्य सफलतापूर्वक नहीं कर पाते।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन लोगों के भीतर किसी भी कार्य को करने के लिए जो दृढ संकल्प की जरूरत होती है वो नहीं होता।जब तक हम किसी भी कार्य को पूरी लगन और मेहनत से नहीं करेंगे तो उस कार्य को पूर्ण होने में संदेह है।इसलिए कहा गया है कि लोगों में बल की नहीं संकल्प-शक्ति की कमी होती है।

आधी दुनिया आनंद-प्राप्ति के लिए गलत रास्ते पर दौड़ी जा रही है।लोग समझते हैं कि वह,संग्रह करने और सेव्य बनने में है,लेकिन है वह त्याग करने और सेवक बनने में।-हेनरी ड्रमंड

अर्थात् सच्चा आनंद तो तब मिलता है जब हम किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं।जब हम ऐसा करते हैं तो जरूरतमंद के चेहरे की ख़ुशी और उसके द्वारा दिया गया आशीर्वाद हमारे मन को सकून और शान्ति प्रदान करता है और इस प्रकार हमें सच्चा आनंद प्राप्त होता है।किसी दूसरे के लिए त्याग करने या उसका कार्य कर उसकी मदद करने से अच्छा काम कोई नहीं है।जो लोग ये सोचते हैं कि धन और सुख सुविधाओं का संचय करके और उन का भोग कर के आनंद प्राप्त किया जा सकता है वे मूर्ख हैं क्योंकि ऐसा कर के वे न केवल मानसिक अशांति,जो हर समय संचित वस्तुओं और धन के खो जाने के भय से होती है,को न्योतते हैं बल्कि विभिन्न प्रकार की बीमारियों के भी शिकार हो जाते हैं।इसलिए व्यक्ति को संग्रह करने और सेव्य बनने से बचना चाहिए और त्यागपूर्वक अन्यों की मदद करनी चाहिए।

यशस्वी होने का सबसे छोटा रास्ता अंतरात्मा के अनुसार चलना है।-होम्ज

अर्थात् हमारी अंतरात्मा हमेशा हमें अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।यदि कभी भूल से भी हम कोई गलत काम करते हैं तो हमारी अंतरात्मा पहले तो हमें आगाह करती है और अगर गलत काम हो जाए तो हमें कचोटती रहती है।इसलिए कभी भी भूल से भी अपनी अंतरात्मा की आवाज के खिलाफ जाने का प्रयास नहीं करना चाहिए।अंतरात्मा की आवाज तो भगवान् की वाणी होती है।जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन कर कार्य करते हैं तो हम कभी भी गलत काम नहीं करते और इस प्रकार लोगों के बीच प्रशंसा के पात्र बन जाते हैं और इस प्रकार यशस्वी हो कर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं।

जो दूसरे आदमी के दुःख में दया दिखाता है,वह स्वयं दुःख से छूट जाएगा;और जो दूसरे के दुःख की अवगणना करता है या उस पर हर्ष मनाता है,वह कभी-न-कभी उसमें स्वयं जा पड़ेगा।-वाल्टर रेले

अर्थात् हमें कभी भी दूसरे के दुःख में ख़ुशी नहीं मनानी चाहिए।ऐसा कर के हम उसके दुःख को बढा रहे होते हैं और उस के मन में अपने लिए कडवाहट घोल रहे होते हैं।वक्त बड़ा ही बलवान होता है।कोई नहीं कह सकता कि जिस दुःख में आज वो व्यक्ति पड़ा हुआ है जिस पर हम हंस रहे हैं,कल को वही दुःख हमें भी अपनी चपेट में नहीं लेगा।उस वक्त कोई भी हमसे सहानुभूति नहीं दिखाएगा।जिस प्रकार ख़ुशी बांटने से बढती है उसी प्रकार दुःख बांटने से कम होता है।जब कोई भी हमारा दुःख बांटने वाला नहीं होगा तो हमारा दुःख कम कैसे होगा और हम उस दुःख के भंवर से कैसे बाहर निकलेंगे।इसलिए कभी भी दूसरों के दुखों पर हँसना नहीं चाहिए।

वह सबसे अधिक जीता है जो सबसे अधिक सोचता है,उत्कृष्टतम भावनाएं रखता है,सर्वोत्तम रीति से कार्य करता है।-बेली

अर्थात् जो व्यक्ति सदा अच्छा सोचता है,सदा लोगों की भलाई के कार्यों में लगा रहता है,सदा विवेकपूर्ण और उत्तम कार्यों को ही करता है,ऐसा व्यक्ति लोगों के बीच प्रशंसा का पात्र बन जाता है।ऐसा व्यक्ति लोगों के दिलो-दिमाग में बस जाता है।मरने के बाद भी लोग उसे याद रखते हैं और वो उन लोगों की यादों में जिन्दा रहता है।जबकि परोपकार के लिए कम सोचने वाला,सदा बुरा करने वाला और सदा लोगों के नुक्सान की भावना रखने वाला व्यक्ति न तो जीते-जी लोगों की बातों का केद्र होता है और न ही मरने के बाद उसे कोई याद रखता है।इसलिए हमें सदैव अच्छा सोचना चाहिए,कभी किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए और सदा लोगों की भलाई के कार्य करते रहना चाहिए ताकि हम लोगों की यादों में अमर हो जाएँ।