विचारणीय:१८

जो बदले का ध्यान रखता है,वह अपने ही घावों को हरा रखता है।-बेकन

अर्थात् जब हमारा कोई अहित करता है तो स्वभावतः हमारे मन में उस के लिए कटुता हो जाती है और हम प्रतिक्षण उस व्यक्ति से बदला लेने की सोचते रहते हैं।यहाँ तक कि जिस व्यक्ति ने हमारा अहित किया था वो भी इस बात को भूल जाता है कि उसने हमारा अहित किया था।पर हम हमेशा बदले की आग में ही जलते रहते हैं।इस प्रकार केवल हम अपने घावों को ही हरा रखते हैं जो उस व्यक्ति ने हमें दिए थे।ऐसा कर के केवल हम अपने को ही कष्ट पहुंचाते हैं।यदि हम अपने को इतना उदार बना लें कि अहित करने वाले व्यक्ति को माफ़ कर सकें तो हम भी शान्ति से जी सकेंगे और हमारे घाव भी भर जायेंगे।इसलिए हमेशा क्षमा दान करते रहना चाहिए।

असफलता की भावना से सफलता का उत्पन्न होना उतना ही असंभव है जितना कि बबूल के वृक्ष से गुलाब के फूल का निकलना।-बायरन

अर्थात् हमें हमेशा सकारात्मक रहना चाहिए और कभी भी बिना प्रयास किये असफलता की भावना को मन में नहीं लाने देना चाहिए।यदि हम किसी कार्य को करने से पूर्व ही हार मान जायेंगे तो उस कार्य को पूरा कैसे करेंगे और यदि उस कार्य को पूरा ही नहीं करेंगे तो सफलता कहाँ से मिलेगी।जिस प्रकार किसी अन्य वृक्ष पर किसी और वृक्ष का फूल नहीं उग सकता ,उदाहरण के लिए गुलाब का फूल तो गुलाब के पौधे से ही निकलता है,उसी प्रकार सफलता की भावना मन में पैदा किये बिना हम सफल नहीं हो सकते।इसलिए हमेशा आत्मविश्वास रखते हुए और ये सोचते हुए कि हम एक दिन अवश्य सफल होंगे,अपना कार्य करते रहना चाहिए।

व्यसनों के प्रति विरोध का नाम ही सदगुण नहीं है,अपितु व्यसनों की ओर प्रवृति का न जाना ही सदगुण है।-बर्नार्ड शॉ

अर्थात् सदगुण तब है,जब हम किसी बुरी प्रवृति में न पड़े।यदि हम ऊपर से तो किसी दुर्व्यसन का प्रतिरोध करते हैं और उसे बुरा कहते हैं पर खुद उस के शिकार हैं तो हमारा ऐसा करना सदगुण नहीं कहलाया जाएगा।खाली ये कहने से कि झूठ बोलना गलत बात है कुछ नहीं होगा।हमें स्वयं झूठ बोलना छोड़ना होगा।इसी प्रकार सभी व्यसनों से अपनी इन्द्रियों को दूर रखना ही सदगुण है न कि सभी विषयों का भोग करते हुए,भोग्य विषयों को बुरा बताना।

पहले अपराधी तो वे हैं जो अपराध करते हैं और दूसरे वे,जो उन्हें होने देते हैं।-फ़ुलर

अर्थात् अपराध करने वाला तो अपराधी होता ही है,उससे बड़ा अपराधी वो होता है जो अपने सामने उस अपराध को होने देता है।अपराधी की तो प्रवृति ही होती है अपराध करना,लेकिन यदि हम उस अपराध करने वाले को समझाते नहीं या उस अपराध को होने से नहीं रोकते तो हम भी उस अपराध के भागी हो जाते हैं।इसलिए हमें हर संभव अपने आस-पास होने वाले अपराधों को रोकने का और उन्हें न होने देने का प्रयास करते रहना चाहिए।

नदी का यह किनारा आह भर कर कहता है,”सामने के किनारे पर ही तमाम सुख हैं,यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ।”सामने का किनारा पहलेवाले से भी गहरी आह भर कर कहता है,”जगत में जितना सुख है,वह तमाम पहले ही किनारे पर है।”-टैगोर

अर्थात् प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य को ही सबसे भाग्यशाली मानता है।उसे हर समय दूसरे की थाली ही व्यंजनों से भरी हुई दिखाई देती है।हालांकि उस व्यक्ति के पास सब कुछ होता है,पर फिर भी वो सोचता है कि मेरे पास कुछ नहीं है।ऐसा मनुष्य की असंतुष्टि की भावना के कारण और तृष्णा के कारण होता है।जितना हमें मिलता है उस में हम संतुष्ट नहीं होते और अधिक होने की तृष्णा हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देती।जरूरी नहीं है जो हम से अधिक धनवान दिखाई दे रहा हो वो वाकई सुखी हो।उसे भी कोई अन्य दुःख जैसे बिमारी आदि हो सकते हैं।इसलिए कभी भी सामने वाले को देख कर अपने से ज्यादा सुखी नहीं मानना चाहिए अपितु उन लोगों की ओर देख कर जिन्हें उतना भी नहीं मिला जितना हमें मिला है,हर पल भगवान् का धन्यवाद करते हुए,संतुष्ट रहना चाहिए।