विचारणीय:१९

सबसे शानदार विजय है अपने पर विजय प्राप्त करना और सबसे ज़लील और शर्मनाक बात है अपने से परास्त हो जाना।-अफ़लातून

अर्थात् अपने पर विजय प्राप्त करने का अर्थ है अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना और अपने से परास्त हो जाने का अर्थ है अपनी इन्द्रियों के वश में हो जाना।जब हम अपनी इन्द्रियों के वश में होते हैं तो हमारा मन सांसारिक भोग-विलास की ओर भागता है।उस सांसारिक भोग-विलास को प्राप्त करने के लिए तब व्यक्ति अधर्म का मार्ग अपना लेता है और ज़लील और शर्मनाक कृत्य करने लग जाता है।वहीँ जिसने अपनी इन्द्रियों को अपनी आत्मा के वश में कर लिया है वो इन भोग-विलास और सांसारिक वस्तुओं के,जो क्षणभंगुर हैं,मोह में नहीं पड़ता।वह अपना जीवन प्रभु भक्ति में और परोपकार में लगाता हुआ बिताता है और इस प्रकार अमर हो जाता है।

यदि हम एक-दूसरे की जिन्दगी की मुश्किलें आसान नहीं करते तो फिर हम जीते ही किसलिए हैं।-इलियट

अर्थात् केवल अपने लिए जीने का कोई महत्व नहीं है।हम सब एक समाज में रहते हैं और जब समाज का कोई भी एक व्यक्ति मुश्किल में है तो समाज सुखी कैसे रह सकता है।कई बार मुश्किल में पड़ा व्यक्ति अपनी मुश्किलों से निकलने के लिए गलत राह पर भी चल पड़ता है।इस प्रकार वो अपनी मुश्किल हल करने के चक्कर में पूरे समाज के लिए मुश्किल पैदा कर देता है।ऐसा सोच कर भी हमें उस की मदद करनी चाहिए।यदि आज हम किसी की मदद नहीं करेंगे तो कल को कौन हमारी मदद करेगा।समाज की तरक्की तभी हो सकती है जब समाज एक जुट हो कर काम करे और उसका कोई भी व्यक्ति मुश्किल में न रहे।इसलिए एक बेहतर समाज और देश के लिए प्रत्येक नागरिक को अन्य नागरिक की मदद करनी चाहिए।

जो व्यक्ति निश्चय कर सकता है,उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।-एमरसन

अर्थात् संसार में कोई भी काम मुश्किल या असंभव नहीं होता,केवल इरादा करने की जरूरत होती है।अक्सर व्यक्ति किसी भी कार्य को देख कर पहले से ही सोच लेता है कि ये काम कितना मुश्किल है और ये काम तो हो ही नहीं सकता,जबकि यदि यो निश्चय कर पूरे मन से उस काम को करता है तो पाता है कि उस से सरल काम तो कोई था ही नहीं।इसलिए बिना कोई काम शुरू किये पहले से ही ये निर्णय न लें कि जो काम आप करने वाले हैं वो तो मुश्किल है और हो नहीं सकता।काम को शुरू कीजिये और आप पायेंगे कि आप के दृढ निश्चय से वो काम कितनी सुगमता पूर्वक हो गया है।

जानना काफी नहीं है,ज्ञान से हमें लाभ उठाना चाहिए;इरादा काफी नहीं है,हमें करना चाहिए।-गेटे

अर्थात् जिस प्रकार केवल चावल को गैस पर रखने से ही चावल नहीं पक जायेंगे,हमें गैस जलानी पड़ेगी,उसी प्रकार केवल किसी विषय का ज्ञान होना ही काफी नहीं होता,हमें उस ज्ञान को प्रयोग में भी लाना चाहिए।ज्ञान कभी भी अपने में सम्पूर्ण नहीं है,हर क्षण ज्ञान बढता ही जाता है और प्रतिक्षण हम कुछ न कुछ नया सीखते ही रहते हैं।यदि हम अपने ज्ञान का उपयोग करेंगे तो हमें और भी सीखने को मिल सकता है।यदि हम किसी कार्य को करने का इरादा कर लेते हैं पर उस काम को करते नहीं तो ऐसे इरादे का क्या फायदा।हमें अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करना भी सीखना चाहिए।जब तक हम अपनी सोच को,अपने इरादे को मूर्त रूप नहीं देंगे तो हम संसार को कुछ नया कैसे दे सकेंगे।जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं उन्होंने अपने ज्ञान को इरादा करने और सोचने में लगाया और अपनी सोच को कार्यान्वित कर संसार को अनेक आविष्कार दिए।

जब किसी का शिकायत करने का यह भाव हो कि उसकी कितनी कम परवाह की जाती है तो वह सोचे कि वह दूसरों की आनंद-वृद्धि में कितना कम योगदान देता है।-जॉनसन

अर्थात् जब हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो कोई हमारी परवाह क्यों करेगा।जब हम केवल अपने आनंद की,अपने ही सुख की सोचेंगे और हर समय मैं-मैं ही करते रहेंगे तो किसी अन्य से ये अपेक्षा कैसे रख सकते हैं वो हमारी परवाह करे।जब हम दूसरों को सुख देंगे,उनके बारे में सोचेंगे,उनके काम आयेंगे,तभी तो वो हमें याद रखेंगे और हमारे सुख-दुःख में काम आयेंगे।इसलिए सदा दूसरों के काम आना चाहिए।