विचारणीय:२०

चित्त की प्रसन्नता ही व्यवहार में उदारता बन जाती है।-प्रेमचंद

अर्थात् जब हम प्रसन्न रहते हैं तभी अच्छा-अच्छा सोच पाते हैं और हमारा व्यवहार भी अन्यों के प्रति उदार हो जाता है।यदि हम चिडचिडे रहेंगे तो हमेशा लड़ाई के मूड में रहेंगे और लोगों की भलाई करने के बदले उन से झगड़ते रहेंगे।इसलिए हमें सदा हंसमुख बने रहना चाहिए।

हज़ार बरस जो बीत गए और हज़ार बरस जो आने वाले हैं,इन सबसे बढ़कर वह समय है जो तुम्हारे हाथ में है।-शिबली मौलाना

अर्थात् कभी भूत की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि भूत तो वो वक्त है जो गुजर चुका है और फिर से नहीं आ सकता।इसलिए जो हो गया है वो हो गया है।इसी प्रकार आने वाले वक्त की चिंता करना भी बेकार है क्योंकि कल कैसा होगा किसी को नहीं पता।हाँ आने वाला कल हमारे वर्तमान पर निर्भर करता है।इसलिए हमें केवल वर्तमान के बारे में सोचना चाहिये और गुजरे वक्त की गलतियों को सुधारते हुए आने वाले कल के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।लोग अक्सर गुजरे कल और आने वाले कल के बारे में चिंतित रह कर अपना वर्तमान खराब कर लेते हैं।हमें अपना वर्तमान हँसी-ख़ुशी और अच्छे –अच्छे कार्य कर के बिताना चाहिए।

ईश्वर तभी सहायक होता है जब आदमी स्वयं सहायक होता है।-शिलर

अर्थात् जब व्यक्ति अपनी मदद खुद नहीं करेगा तो उसकी मदद कौन करेगा?यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे और ये सोचते रहेंगे कि कोई और आएगा और हमारा काम कर जाएगा तो ऐसा नहीं होगा।पर जब हम कोई काम खुद अपने बलबूते पर शुरू करते हैं तो वक्त के साथ-साथ अन्य लोग भी इस में जुड़ जाते हैं।प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का वास होता है,इसलिए अन्य शब्दों में हम ये कह सकते हैं कि जब हम अपनी सहायता स्वयं करने लगते हैं तो भगवान् भी मनुष्य रूप में हमारी सहायता करता है।

दोस्त वे हैं जो कैदखाने में काम आयें।दस्तरखान पर तो दुश्मन भी दोस्त दिखाई देता है।-सादी

अर्थात् सच्चा दोस्त वो होता है जो मुसीबत में हमारे काम आता है।अक्सर जब हम संपन्न होते हैं और धन संपत्ति से युक्त होते हैं अर्थात दस्तरखान पर होते हैं तो अनेक चापलूस हमारे दोस्त बन जाते हैं।पर ये हमारे अच्छे दोस्त नहीं होते।ये केवल हमारी हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं और हमें कोई सही सलाह नहीं देते।वो हमारी गलतियों पर हमें आगाह नहीं करते।वास्तव में वो दोस्त के वेश में दुश्मन होते हैं पर क्यों कि वे हमारी चापलूसी करते रहते हैं इसलिए हमें अपने मित्र दिखाई देते हैं।लेकिन ऐसे लोग तब तक ही होते हैं जब तक हमारे पास पैसा होता है।और जब पैसा नहीं होता तो वो हमें छोड देते हैं।सच्चा दोस्त ऐसे वक्त में भी जब हम मुसीबत में होते हैं अर्थात् कैदखाने में होते हैं,हमारा साथ नहीं छोड़ता।हमें ऐसे मित्रों का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिए।

जो कुछ मैं नहीं जानता,उसके विषय में अपनी अज्ञानता स्वीकार करने में मुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती।-सिसरो

अर्थात् कभी भी अपनी अज्ञानता पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।यदि हम कुछ जानते नहीं हैं तो हमें इस बात को छुपाना नहीं चाहिए।ऐसा करने से हम उस के बारे में सीखने से वंचित रह जाते हैं।पर यदि हम इस बात को स्वीकार कर लें कि हम नहीं जानते तो हो सकता है हमें ये सब किसी अन्य से सीखने को मिल जाए।इसलिए कभी भी अपनी कमियों को छुपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।