विचारणीय:२१

वही सबसे धनवान है जो सबसे कम पर संतोष कर सकता है,क्योंकि संतोष ही सच्चा धन है।-सुकरात

अर्थात् अक्सर लोग निन्यानवे के चक्कर में पड़े रहते हैं।जितना भी वे कमा लें या संचित कर लें उनको कम ही लगता है।इस प्रकार वे सदा अपने को गरीब ही मानते रहते हैं और संतोष न होने के कारण अपनी सबसे कीमती वस्तु,सुख-चैन खो देते हैं।और इस प्रकार गरीब बने रहते हैं।वहीँ जो संतोषी है,वो कम में भी संतोष कर लेता है।उसे अधिक की चाह नहीं होती।इसलिए न तो वह किसी को देख कर जलता है और न ही अधिक इकठ्ठा करने के चक्कर में अपना सुख-चैन ही खोता है।इसलिए वही सबसे धनवान है जो संतोषी है।अत: हमें हमेशा संतोषी बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

बुद्धिमान कभी अपनी हानि पर रोते-धोते नहीं;बल्कि प्रसन्नतापूर्वक अपनी क्षति को पूर्ण करने का उपाय करते हैं।-शेक्सपियर

अर्थात् जो बुद्धिमान व्यक्ति है उसे पता होता है कि हानि-लाभ तो आनी-जानी बात है।यदि आज हानि हुई है तो कल लाभ भी होगा।इसलिए वो इस बात पर रोता नहीं रहता कि उसकी हानि हो गयी है।क्योंकि उसे पता है कि यदि वो ऐसा करेगा तो वह केवल अपना समय ही नष्ट करेगा।केवल रोने-धोने से तो उस हानि की पूर्ति नहीं हो सकती।उसके लिए तो उपाय करने होंगे।जो ऐसा सोच कर प्रयत्न करता है और अपनी क्षति को पूर्ण करने का उपाय प्रसन्नतापूर्वक करता है वो शीघ्र ही उस हानि से पार पा कर लाभ को प्राप्त करता है।ऐसे व्यक्ति को ही बुद्धिमान कहते हैं और हमें ऐसे बनने का ही प्रयास करना चाहिए।

किसी को अपनी सराहना करने के लिए विवश कर देने का केवल एक ही उपाय है कि आप शुभ कर्म करें।-वाल्टेयर

अर्थात् जिस प्रकार सुगन्धित फूल की खुशबू हर ओर फ़ैल जाती है उसी प्रकार सदगुणों से भरे व्यक्ति की प्रसिद्धि भी चहुँ ओर फ़ैल जाती है।जब व्यक्ति शुभ कर्म करता है तो अन्य उसे पसंद करने लगते हैं क्योंकि शुभ कर्म करने वाला व्यक्ति किसी की हानि नहीं करता अपितु मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए लगा रहता है और सब लोगों के काम आता है।धीरे-धीरे वो इतना लोकप्रिय हो जाता है कि लोग उसकी सराहना करने पर विवश हो जाते हैं।शुभ कर्म करने वाले व्यक्ति की सराहना तो उसके शत्रु भी करते हैं।अत: हमें सदा शुभ कर्म करते रहने चाहियें।

यह बात कुछ महत्व नहीं रखती कि आदमी कैसे मरता है,बल्कि यह है कि वह कैसे जीता है।-जॉनसन

अर्थात् जो इस संसार में जन्म लेता है उसे एक न एक दिन मरना ही पड़ता है।विभिन्न लोग विभिन्न प्रकार से मृत्यु को प्राप्त होते हैं।मृत्यु होने के पश्चात लोग अक्सर उन्हें भूल जाते हैं।केवल ऐसे ही व्यक्ति मरने के बाद लोगों द्वारा यद् रखे जाते हैं जो उम्र भर दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते रहते हैं,सदा शुभ कर्म करते रहते हैं और बिना किसी को कष्ट दिए प्रभु भक्ति में लीन  रहते हैं।मरते तो सभी हैं पर जो व्यक्ति जीते जी अच्छे कार्य करता है केवल उसको ही लोग मरणोपरांत याद रखते हैं और ऐसे व्यक्ति का ही जीना सफल होता है।इसलिए हमें भी सदा ऐसे कार्य करते रहना चाहिए कि लोग मरने के बाद भी हमें याद रखें।तभी हम अपना जीवन सफल मान पायेंगे।

ईर्ष्यालु लोग औरों के लिए कष्टकर हैं,लेकिन स्वयं अपने लिए महान दुखदायक।-विलियम पैन

अर्थात् ये मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है कि उसे दूसरों की थाली में अधिक घी दिखाई देता है।दूसरों की ख़ुशी और तरक्की देख कर अक्सर लोग ईर्ष्यालु हो जाते हैं।अपनी इस ईर्ष्या के कारण वे उस व्यक्ति को कष्ट देने के और नुक्सान पहुंचाने के तरीके खोजते रहते हैं और वक्त मिलते ही नुक्सान पहुंचाने से नहीं चूकते।लेकिन वे भूल जाते हैं कि वे ईर्ष्या करते हुए खुद का कितना नुक्सान कर रहे होते हैं।ईर्ष्या की आग में जलते हुए उनको रातों को नींद भी नहीं आती।वे खुद का सुख-चैन खो देते हैं।वे रात दिन दूसरों को कष्ट देने के बारे में ही सोचते रहते हैं और इस लिए अपने काम का भी नुक्सान कर बैठते हैं।इस प्रकार वे ईर्ष्या कर के दूसरे को तो कष्ट देते ही हैं पर स्वयं के लिए भी महा-दुखदायी होते हैं।