विचारणीय:२२

अगर तुम झगड़े का सामान देखो तो ख़ामोश हो जाओ;इसलिए कि ख़ामोश मिजाज झगड़े का फाटक बंद कर देता है।-सादी

अर्थात् यदि हम झगडे का जवाब झगडे से देंगे तो वो आग में घी डालने जैसा होगा और इससे झगडा बढेगा ही घटेगा नहीं।वहीँ यदि हम किसी के झगड़ने पर भी,झगडे के लिए उकसाने पर भी शांत रहेंगे और ऐसा करने वाले को एक मुस्कान से प्रत्युत्तर देंगे तो झगडा होगा ही नहीं।जब हम ख़ामोश रहेंगे तो झगड़ने वाले को झगड़ने का कोई मुद्दा ही नहीं मिलेगा और वो भी समझ जाएगा कि हम झगड़ना नहीं चाहते।इस तरह वो भी हमसे झगड़ना छोड देगा।इसलिए कहा है कि ख़ामोश मिजाज झगडे का फाटक बंद कर देता है।

मैंने अपने जीवन में यह बहुत देर में जाना कि“ मै नहीं जानता“ कहना कितना अच्छा है।-समरसेट माम

अर्थात् कभी-कभी व्यक्ति किसी विषय के बारे में नहीं जानता,फिर भी कहता रहता है कि वो जानता है।ऐसा कर के वो खुद को ही धोखा दे रहा होता है और अपने लिए कुछ सीखने का द्वार बंद कर लेता है।पर जब वही व्यक्ति ये स्वीकार कर लेता है कि उसे सम्बंधित विषय की जानकारी नहीं है तो संभव है कोई न कोई उसे सम्बंधित विषय के बारे में सिखा दे।इसलिए ये कहना कि “मैं नहीं जानता” कितना अच्छा होता है।क्योंकि सीखने की कोई सीमा नहीं होती और व्यक्ति निरंतर सीखता रहता है।इसलिए ये कह कर कि हम सब जानते हैं सीखने का द्वार कभी बंद नहीं करना चाहिए।

मूर्ख स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं,किन्तु वास्तविक बुद्धिमान स्वयं को मूर्ख ही मानते हैं।-शेक्सपियर

अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि जितना भी उसने किसी विषय के बारे में सीखा है वो पर्याप्त नहीं है क्योंकि प्रतिक्षण उसमें नयी बातें जुडती जाती हैं और व्यक्ति निरंतर उन्हें सीखता रहता है।इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने को बुद्धिमान नहीं कहता,बल्कि मूर्ख मानता है।वहीँ मूर्ख सोचता है कि उसने सब सीख लिया है और इसलिए वो बुद्धिमान हो गया है,जबकि वो नहीं जानता कि सीखने की प्रक्रिया तो निरंतर चलती रहती है।ऐसा सोच कर कि वो सब जानता है खुद को मूर्ख ही साबित करता है।

निजी सद्गुणों के सिवाय कुछ भी शाश्वत नहीं है।-वाल्ट हिटमैन

अर्थात् जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं होता।यहाँ तक कि व्यक्ति की भी एक दिन मौत हो जाती है।पर फिर भी कुछ लोगों को मरने के बाद भी लोग याद रखते हैं और कुछ को भूल जाते हैं।लोग उन्हीं लोगों को याद रखते हैं जो हमेशा लोगों की भलाई में लगे रहते हैं।सदा अच्छे –अच्छे कार्य करते हैं।भूल कर भी किसी का बुरा नहीं करते।अर्थात् हमेशा सद्गुणों से भरे रहते हैं।ऐसे व्यक्ति मरने के बाद भी लोगों की याद में जिन्दा रहते हैं और लोग उनके द्वारा किये गए सत्कर्मों को याद करते हैं और उनके सद्गुणों को याद करते हैं।इसलिए कहा है कि निजी सद्गुणों के सिवाय कुछ भी शाश्वत नहीं है।

मरने के बाद स्वर्ग में रहने के लिए हमें मरने से पहले स्वर्ग में रहना होगा।-हाइटिंग

अर्थात् जब हम अच्छे कार्य करते हैं,सदा दूसरों की मदद करते हैं,आपस में मिल जुल कर रहते हैं और सदाचार का पालन करते हैं तो संसार में कोई झगडा नहीं रहता,लोग आपस में प्रेम से रहते हैं और ये जगत स्वर्ग तुल्य हो जाता है।जब ये संसार स्वर्ग तुल्य हो जाता है और हमारे सद्गुणों के कारण हम प्रभु के प्रिय हो जाते हैं और इस प्रकार मृत्य उपरान्त स्वर्ग के भागी होते हैं।