विचारणीय:२३

शान्ति ठीक वहाँ से शुरू होती है,जहां महत्वाकांक्षा का अंत हो।-यंग

अर्थात् जब हम महत्वाकांक्षी होते हैं तो आगे बढने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं।इससे हम अन्य लोगों को अपना शत्रु बना लेते हैं और झगडे को न्योता देते हैं।कभी-कभी हम स्वयं भी आगे बढ़ने के लिए किसी और से लड़ने से पीछे नहीं रहते।पर जब हम अपनी महत्वाकांक्षा को छोड देंगे तो अन्यों को अपने साथ ले कर चलेंगे और आगे बढ़ने के लिए उनका इस्तेमाल नहीं करेंगे।इस तरह हम उनके साथ गलत कर झगडे को नहीं आमंत्रित करेंगे और इस तरह अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ते ही हम अपने आस-पास एक शांति का माहौल पायेंगे।इसलिए कहा गया है कि शांति ठीक वहाँ से शुरू होती है,जहां महत्वाकांक्षा का अंत होता है।

उसने अपनी आत्मा की उज्ज्वलता को कायम रखा था,इसलिए लोग उसके लिए यूँ रोये।-बायरन

अर्थात् लोग केवल ऐसे व्यक्ति को ही याद रखते हैं जिन्होंने कभी उन की मदद की हो,जो परोपकारी हों और जिन्होंने हमेशा सद्कार्य किये हों।जब व्यक्ति सद्कार्य करता है,परोपकार के काम करता है तो उसकी आत्मा और भी निर्मल और उजली हो जाती है।ऐसे व्यक्ति जब इस संसार से विदा होते हैं तो लोग उनके लिए रोते हैं और उनके सद्कार्यों को याद करते हैं।ऐसे व्यक्ति मर कर भी अमर ही रहते हैं।इसलिए कहा गया है कि जिस व्यक्ति ने अपनी आत्मा की उज्ज्वलता को कायम रखा था,उसके लिए लोग रोये थे।

विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखानेवाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला।-प्रेमचंद

अर्थात् जब हम विपत्ति में होते हैं तो या तो हम डर के बैठ जाते हैं या हम उससे निकलने के तरीके खोजने लगते हैं।जो व्यक्ति विपत्ति से निकलने के तरीके खोजता है वो अंततः उससे निकल भी जाता है।इस प्रकार विपत्ति का सामना करते हुए हम अपने डर से जीतना सीखते हैं।साथ ही साथ हम कष्टों का,विपत्तियों का सामना करना सीखते हैं और उनसे निकलने के उपाय भी सीखते हैं।इस प्रकार हम अपने जीवन में सबसे बेहतर अनुभव को सीख पाते हैं।इसलिए विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला।

सफलता का रहस्य यह है कि अपने लक्ष्य को सदा सामने रखो।-डिजराइली

अर्थात् जब हम अपने लक्ष्य को सामने रखते हैं तो उसको पाने के लिए दुगनी मेहनत से काम करते हैं।हम लक्ष्य को पाने के अपने संकल्प को याद करते रहते हैं और इस तरह उसको प्राप्त करने के अपने संकल्प को और दृढ करते हैं।इस प्रकार दृढ संकल्प और इच्छा-शक्ति से हम सफलता की ऊंचाइयों को छू लेते हैं और अंततः अपने लक्ष्य को पा लेते हैं।इसलिए सफलता का रहस्य यह है कि हम अपने लक्ष्य को हमेशा अपने सामने रखें।

पापी हो या पुण्यात्मा अथवा वध के योग्य अपराध करने वाला ही क्यों न हो,उन सबके ऊपर श्रेष्ठ पुरूष को सदैव दया करनी चाहिए क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो सर्वथा अपराध न करता हो।-वाल्मीकि

अर्थात् प्रत्येक मनुष्य से कभी न कभी कोई अपराध हो जाता है।चाहे वो जान बूझ कर किया जाए या अनजाने में हो जाए।जब हम सभी से अपराध होता है तो हम अन्यों को उनके अपराधों की सजा देने वाले कौन होते हैं।हम सभी के अपराधों की सजा देना तो भगवान् के  हाथ में होता है।श्रेष्ठ व्यक्ति ये जानता है और इस प्रकार वो पापी हो या पुण्यात्मा अथवा वध के योग्य अपराध करने वाला ही क्यों न हो,सभी के ऊपर दया करता है।