विचारणीय:२६

यदि आदमी सीखना चाहे तो हर  एक भूल उसे शिक्षा दे सकती है।गांधी 

अर्थात् अक्सर व्यक्ति की प्रवृति होती है कि वो सोचता है कि वो सब जानता है और इसलिए कोई भूल भी हो जाती है तो वो उसे मानता नहीं है।जब व्यक्ति ऐसा करता है तो अपने दिमाग के ढक्कन बंद कर लेता है और अपनी गलतियों से सीखना नहीं चाहता।पर व्यक्ति यदि चाहे तो हर भूल या गलती उसको सिखा सकती है कि किस वजह से वो गलती हुई थी और अपनी भूल से सबक ले कर व्यक्ति भविष्य में उस भूल को दोबारा न करने की कला सीख सकता है।कहने का तात्पर्य है अपनी भूलों और गलतियों को स्वीकार करना सीखें और ऐसा कर के भविष्य में उन भूलों और गलतियों को फिर से न करने की कला सीखें।

ज्ञान ही वास्तविक सोना अथवा हीरा है।–स्वामी शिवानन्द

अर्थात् रुपया-पैसा तो कभी आता है और कभी हाथ से चला जाता है।कभी-कभी ऐसा वक्त भी आता है जब व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में आ जाता है कि रुपया-पैसा भी उसके कोई काम नहीं आता।उस वक्त केवल उसका ज्ञान ही उसे उस कठिन परिस्थिति से बाहर निकाल पाता है।इसलिए ठीक ही कहा गया है कि ज्ञान ही वास्तविक सोना अथवा हीरा है।    

इच्छा की तृप्ति नहीं वरन् उसकी उपेक्षा ज्ञान कहलाती है।–ब्रेरंत

अर्थात् अधिकांश व्यक्ति प्रतिक्षण धन सम्पदा पाने का प्रयास करते रहते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में ही लगे रहते हैं।ऐसे व्यक्ति नहीं जानते कि इच्छाएँ तो कभी पूरी नहीं होती और वक्त के साथ साथ बढती ही जाती हैं।जिस प्रकार निन्यानवे कमाने वाला व्यक्ति ,एक रुपया और कमा कर सौ करने में लगा रहता रहता है अर्थात् निन्यानवे के चक्कर में लगा रहता है ,उसी प्रकार हमारी इन्द्रियाँ हमें कभी भी तृप्त नहीं होने देती।जो व्यक्ति यह जानता है,वो कभी भी अपनी इन्द्रियों का गुलाम हो कर व्यर्थ की इच्छाओं को नहीं पालता,बल्कि अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर के उन इच्छाओं की उपेक्षा करता है।वास्तव में ऐसा करने वाला व्यक्ति ही ज्ञानी है।

यदि आपके पास ज्ञान है ,तो दूसरों को अपने दीप उससे जला लेने दीजिये।–मारग्रेट फुलर

अर्थात् कभी भी अपने ज्ञान को अपने तक सीमित नहीं रखना चाहिए।जिस प्रकार ठहरे हुए पानी में काई जम जाती है ,उसी प्रकार यदि व्यक्ति अपने ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखता है तो एक समय ऐसा आता है जब उसका ज्ञान स्वयं उसके लिए भी महत्वहीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान निरंतर सीखने की कला है।जब व्यक्ति अपना ज्ञान बांटता है तो वो बदले में दूसरे व्यक्ति से भी कुछ न कुछ सीखता है।इस प्रकार उसके स्वयं के ज्ञान में कुछ न कुछ बढ़ोतरी होती रहती है।इसलिए यदि व्यक्ति के पास ज्ञान है ,तो दूसरों को अपने दीप उससे जला लेने देने चाहियें।

ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए।–महात्मा गांधी

अर्थात् ज्ञान हमें अच्छे बुरे में फर्क करना सिखाता है।जिस व्यक्ति का चरित्र अच्छा है ,वही जीवन में अच्छे ,परोपकारी कार्य कर सकता है।कुछ व्यक्ति अपने ज्ञान का उपयोग केवल धन-सम्पति अर्जित करने के लिए करते हैं और इस के लिए सभी अच्छे बुरे काम करते हैं।पर वे भूल जाते हैं कि गलत कार्यो द्वारा अर्जित धन लम्बे समय तक नहीं रहता और शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।पर जिस व्यक्ति का चरित्र सबल है वो समाज सेवा के कार्य करते हुए अपने लिए सम्मान ,प्रेम और कीर्ति का कभी न नष्ट होने वाला धन अर्जित करता है जो उसके मरने के बाद भी नष्ट नहीं होता।इसलिए ऐसा सोच कर ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र-निर्माण रखना चाहिए।